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Monday, February 20, 2017

हाथ और पैरों के तलवों में जलन,Home Remedies For Burning Feet In Hindi,

हाथ और पैरों के तलवों में जलन,Pairo-ke-Taluo-ki-Jalan-Dur-Karane-ke-Upay
अक्सर कई लोगो को हाथो और पैरो में जलन होती हैं, वैसे तो ये समस्या गर्मियों में अधिक होती हैं, मगर कई बार कुछ बीमारियो के कारण ये सर्दियों में भी होती हैं। आज हम आपको बताएँगे इसके कारण और इसके सरल उपचार।

पैरों में जलन के कारण ,Causes of Burning Legs 

  • तंत्रिका तंत्र में शिथिलता या कमजोरी 
  • मधुमेह
  • अधिक शराब का सेवन 
  • विषाक्त पदार्थों का सेवन 
  • विटामिन बी, कैल्शियम और फोलिक एसिड की कमी 
  • किडनी रोग
  • पैर सिंड्रोम
  • अधिक गर्म दवाओं का सेवन
  • रक्त प्रवाह का कम होना  

हाथ और पैरों के तलवों में जलन,Pairo-ke-Taluo-ki-Jalan-Dur-Karane-ke-Upay

  • करेला : करेले के पत्तों का रस निकालकर पैरों के तलुवों पर इसकी मालिश करने से पैरों की जलन दूर हो जाती है। करेले के पत्तों को पीसकर पैरों पर लेप करने से भी इस रोग में लाभ होता है।
  • सरसो का तेल और लहसुन : सरसो के तेल में 3-4 लहसुन की कलियाँ काट कर तब तक गरम करे जब तक लहसुन की कलियाँ काली ना पड़ जाये। फिर उस तेल से हथेली और पैरो के तलवो में मालिस करने से जलन में आराम मिल जायेगा। सरसो के तेल में अनामिका ऊँगली को डुबो कर अपनी नाभि पर लेटकर गोल गोल तब तक घुमाए जब तक नाभि सारा तेल ना सोख ले। यह दोनों सबसे उत्तम तरीके है जलन से निजात पाने के।
  • लौकी : लौकी को काटकर इसके गूदे को पैरों के तलुवों पर लगाने से पैरो की गर्मी, जलन आदि दूर हो जाती है।
  • सरसों : हाथ-पैरों या पैरों के तलुवों में जलन होने पर सरसों का तेल लगाने से लाभ होता है। 2 गिलास गर्म पानी में 1 चम्मच सरसों का तेल मिलाकर रोजाना दोनों पैर इस पानी के अंदर रखें। 5 मिनट के बाद पैरो को किसी खुरदरी चीज से रगड़कर ठण्डे पानी से धोने से पैर साफ रहते हैं और पैरों की गर्मी दूर होती है।
  • मेहंदी : गर्मी के मौसम में जिन लोगों के पैरों में लगातार जलन होती रहती है उनकें पैरों में मेंहदी लगाने से उनकी जलन दूर हो जाती है।
  • आम : आम की बौर (फल लगने से पहले निकलने वाले फूल) को रगड़ने से हाथों और पैरों की जलन समाप्त हो जाती है।
  • धनिया : सूखे धनिये और मिश्री को बराबर मात्रा में लेकर पीस लें। फिर इसको 2 चम्मच की मात्रा में रोजाना 4 बार ठंडे पानी से लेने से हाथ और पैरों की जलन दूर हो जाती है।
  • मक्खन : मक्खन और मिश्री को बराबर मात्रा में मिलाकर लगाने से हाथ और पैरों की जलन दूर हो जाती है। 
  • कतीरा (कतीरा एक प्रकार का गोंद होता है) : 2 चम्मच कतीरा को रात को सोने से पहले 1 गिलास पानी में भिगों दें। सुबह कतीरा के फूल जाने इसको शक्कर के साथ मिलाकर रोजाना खाने से हाथों और पैरों की जलन दूर हो जाती है। वैसे तो यह हर मौसम में काम आता है लेकिन गर्मियों में बहुत ही लाभदायक होता है।
  • विटामिन : शरीर में विटामिन बी-1 की कमी के कारण भी पैरो के तलुओ में जलन होती हैं इसलिए भोजन में विटामिन बी-1 का इस्तेमाल करे। इसके लिए मटर, हरी सब्जिया, आलू, दूध, अंकुरित गेंहू, काजू इसके अच्छे स्त्रोत हैं।
  • ब्लड शुगर : अपनी ब्लड शुगर की भी जांच ज़रूर करवाये, कुछ रोगियों को ब्लड शुगर के कारण ऐसी समस्याओ का सामना करना पड़ता हैं।

Thursday, February 16, 2017

गाँठ का उपचार,Lump Treatment in Hindi,Lump Treatment in Ayurveda

अक्सर हमारे शरीर के किसी भी भाग में गांठे बन जाती हैं. जिन्हें सामान्य भाषा में गठान या रसौली कहा जाता हैं. किसी भी गांठ की शुरुआत एक बेहद ही छोटे से दाने से होती हैं. लेकिन जैसे ही ये बड़ी होती जाती हैं. इन गाठों की वजह से ही गंभीर बीमारियां भी हो जाती हैं. 
  • ये गांठे टी.वी से लेकर कैंसर की बीमारी की शुरुआत के चिन्ह होती हैं. अगर किसी व्यक्ति के शरीर के किसी भाग में कोई गाँठ हो गई हैं. जिसक कारण उस गाँठ से आंतरिक या बाह्य रक्तस्राव हो रहा हो. तो हो सकता हैं कि यह कैंसर की बीमारी के शुरुआती लक्षण हो. 
  • लेकिन इससे यह भी सुनिश्चित नहीं हो जाता कि ये कैंसर के रोग को उत्पन्न करने वाली गांठ हैं. कुछ गाँठ साधारण बिमारी उत्पन्न होने के कारण भी हो जाती हैं. 
  • किन्तु हमें किसी भी प्रकार की गांठों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए तथा उसका तुरंत ही उपचार करवाना चाहिए. 
  • कुछ स्त्रियाँ या पुरुष नासूर या ऑपरेशन कराने के डर से जल्द गाँठ का इलाज नहीं करवाते. लेकिन ऐसे व्यक्तियों के लिए यह समझना बहुत ही आवश्यक हैं कि इन छोटी सी गांठों को यदि आप लगातार नजरअंदाज करेंगें. 
  • तो इन गांठों की ही वजह से ही आपको बाद में अधिक परेशानी का सामना करना पड सकता हैं. आज हम आपको शरीर के किसी भी भाग में होने वाली गांठ को ठीक करने के लिए कुछ आयुर्वेदिक उपचारों के बारे में बतायेंगें.

गाँठ का उपचार,Lump Treatment in Hindi,Lump Treatment in Ayurveda,

  • कचनार की छाल और गोरखमुंडी (Bauhinia Bark And Gorkmundi) किसी भी तरह की गाँठ को ठीक करने के लिए 25 से 30 ग्राम तक कचनार की ताज़ी और सुखी छाल लें और इसे मोटा – मोटा कूट लें. अब एक गिलास पानी लें और इस पानी में कचनार की कुटी हुई छाल डालकर 2 मिनट तक उबाल लें.जब यह अच्छी तरह से उबल जाएँ. तो इसमें एक चम्मच पीसी हुई गोरखमुंडी डाल दें. अब इस पानी को एक मिनट तक उबालें. 
  • इसके बाद आप इस पानी को छानने के बाद इसका दिन में दो बार सेवन कर सकते हैं. इस पानी का सेवन करने के बाद आपको गलें, जांघ, हाथ, प्रोटेस्ट, काँख, गर्भाशय, टॉन्सिल, स्तन तथा थायराइड के कारण निकली हुई गाँठ से लगातार 20 – 25 दिनों तक सेवन करने से छुटकारा मिल जाएगा. 
  • आकडे का दूध (Figures Milk) – गाँठ को ठीक करने के लिए आप आकडे के दूध में मिटटी मिला लें. अब इस दूध का लेप जिस स्थान पर गाँठ हुई हैं. वहाँ पर लगायें आपको आराम मिलेगा. 
  • निर्गुण्डी (Nirgundi) – किसी भी प्रकार की गाँठ से मुक्त होने के लिए 20 से 25 मिली काढ़ा लें और उसमें 1 से 5 मिली लीटर तक अरंडी का तेल मिला लें. इन दोनों को अच्छी तरह से मिलाने के बाद इस मिश्रण का सेवन करें. तो आपकी गांठ ठीक हो जायेगी. 
  • गेहूं का आटा (Wheat Flour) – गेहूं का आटा लें और उसमें पानी डाल लें. अब इस आटे में पापड़खार मिला लें और इसका सेवन करें. आपको लाभ होगा. 
  • गण्डमाला की गाँठें (Goitre) गले में दूषित हुआ वात, कफ और मेद गले के पीछे की नसों में रहकर क्रम से धीरे-धीरे अपने-अपने लक्षणों से युक्त ऐसी गाँठें उत्पन्न करते हैं जिन्हें गण्डमाला कहा जाता है। मेद और कफ से बगल, कन्धे, गर्दन, गले एवं जाँघों के मूल में छोटे-छोटे बेर जैसी अथवा बड़े बेर जैसी बहुत-सी गाँठें जो बहुत दिनों में धीरे-धीरे पकती हैं उन गाँठों की हारमाला को गंडमाला कहते हैं और ऐसी गाँठें कंठ पर होने से कंठमाला कही जाती है। 
  • क्रौंच के बीज को घिस कर दो तीन बार लेप करने तथा गोरखमुण्डी के पत्तों का आठ-आठ तोला रस रोज पीने से गण्डमाला (कंठमाला) में लाभ होता है। तथा कफवर्धक पदार्थ न खायें।

Monday, February 13, 2017

मांसपेशियों में खिंचाव,Home Remedies for Pulled Muscle in Hindi,


Treatment Of Pulled Muscle‎ in Hindi,

मांसपेशियों का दर्द या ऐंठन आमतौर पर पाई जाने वाली समस्याओं में से एक है। और यह एक से अधिक मांसपेशियों में हो सकता है। मांसपेशियों के दर्द में, ऊतक के लिगामेंट, टेंडोंस, फेशिया, और मांसपेशियों के संपर्क में आनेवाले कोमल ऊतकों और हड्डियों में दर्द हो सकता है।

कभी काम करते-करते, दिनचर्या में भाग दौड़, कभी खेलते या दौड़ते में और कभी यूं ही सामान्य अवस्था में अचानक मांसपेशियों में खिंचाव आ जाता है। इस खिंचाव को हल्के में न लें यह एक बड़ी समस्या भी बन सकती है अधिक व्यायाम करने से भी मांसपेशियों में दर्द हो जाता है। इस स्थिति में हमारे शरीर को अधिक ऑक्सीजन की आवश्यकता होती है। इस अधिक ऑक्सीजन की आवश्यकता की पूर्ति करने के लिए मांसपेशियों में अवायुश्वसन होता है जिसके कारण लेक्टिक एसिड एकत्रित होने लगता है। इस लेक्टिक एसिड के कारण मांसपेशियों में थकान और दर्द होता है।

मांसपेशियों में खिंचाव आने के कारण 

  • अनियमित जीवन शैली और गलत खान-पान इस बीमारी का सबसे बड़ा कारण है. शरीर को पर्याप्त मात्रा में कैल्शियम नहीं मिलने से हड्डियां कमजोर हो जाती हैं. अधिक वजन होने से भी कमर, घुटने में दर्द जैसी समस्या होती है. 
  • पेट बढ़ने से रीढ़ पर तनाव बढ़ता है, जिससे कमर दर्द शुरू हो जाता है. अचानक झुकने, वजन उठाने, झटका लगने, गलत तरीके से उठने-बैठने और सोने, व्यायाम न करने से भी कमर दर्द या मांसपेशियों का दर्द हो सकता है. 
  • ऊबड़-खाबड़ रास्तों में तेज ड्राइविंग से भी रीढ़ की डिस्क प्रभावित हो सकती है. कठोर श्रम या चोट हो सकता है कारण मांसपेशियों में दर्द पूरे शरीर की स्थिति का संकेत हो सकता है. 
  • शारीरिक परिश्रम या कठोर श्रम के कारण तनाव, थकान या मांसपेशियों में चोट, इन्फ्लूएंजा, लाइम डिजीज, मलेरिया, डेंगू, मांसपेशी का फोड़ा तथा संक्रमण की वजह से भी दर्द हो सकता है. इलेक्ट्रोलाइट का असंतुलन जैसे-पोटैशियम या कैल्शियम की मात्रा बहुत कम होना भी इसका कारण हो सकता है.

मांसपेशियों में खिंचाव आने के लक्षण:

जब मसल्स का खिचांव होता है तो तेज दर्द के साथ कुछ अन्य लक्षण भी है जोे आज हम आपको बता रहे है।
  • यदि किसी खुली चोट की वजह से मसल्स फटी या टूटी हैं तो खुला घाव नजर आना।
  • जहा दर्द हो रहा हो उस जगह पर सूजन।
  • चलने-फिरने में भी कठिनाई आना और दर्द होना।
  • बेचैन करने वाला दर्द और आराम करने पर भी दर्द का बने रहना।
  • प्रभावित स्थान पर त्वचा के रंग का बदल जाना व अकड़न महसूस होना।
  • कमजोरी महसूस होना।

मांसपेशियों में खिंचाव आने पर प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार

  • मांसपेशियों में खिंचाव आने पर रोगी व्यक्ति को पूरी तरह से आराम करना चाहिए।
  • रोगी को अपनी मांसपेशियों पर हर 2 घण्टे के अन्तराल पर आधे घण्टे के लिए बर्फ से मालिश करनी चाहिए।
  • मांसपेशियों में खिंचाव से पीड़ित रोगी को गर्म तथा ठंडा स्नान करना चाहिए।
  • मांसपेशियों में खिंचाव से पीड़ित रोगी को विटामिन `सी´ की मात्रा वाली चीजों का भोजन में अधिक सेवन करना चाहिए।
  • जडी बूटियाँ और लेप कुछ जडी बूटियों में एंटी इम्फ्लेमेट्री (प्रदाहनाशी) और आरामदायक गुण होते हैं। जबकि हर्बल लेप (जडी बूटियों के अर्क का अर्द्ध ठोस रूप जो लोशन, जेल या बामके रूप में होता है) त्वचा तथा ऊतकों में अंदर तक प्रवेश करते हैं तथा आराम पहुंचाते हैं।
  • मांसपेशियों में खिंचाव आने पर तेल से शरीर की मालिश करनी चाहिए जिसके फलस्वरूप दर्द जल्दी ही ठीक हो जाता है।
  • प्रभावित स्थान पर बर्फ लगाने से सूजन, ब्लीडिंग और दर्द में आराम मिलता है। मांसपेशियों में खिंचाव आने के बाद जितनी जल्दी आप बर्फ लगा सकते हैं, लगा लें। आप कितनी भी बार बर्फ लगा सकते हैं। बस ये ध्यान में रखें कि जब भी बर्फ लगाएं, 15 मिनट से ज्यादा देर के लिए न लगाएं।
  • तेल से मालिश मालिश से मांसपेशियों में रक्त परिसंचरण बढ़ता है जिससे मांसपेशियों को गर्मी मिलती है तथा यह लेक्टिक एसिड को दूर करता है जबकि तेल मांसपेशियों को आराम पहुंचाता है और दर्द से राहत दिलाता है। विभिन्न प्रकार के तेल जैसे पाइन, लैवेंडर, अदरक और पिपरमेंट का तेल मांस पेशियों के दर्द को कम करने में सहायक होते हैं।
  • एप्सम सॉल्ट (Epsom salt) गर्म पानी की एक बाल्टी में या टब में एक कप एप्सम नमक डाल कर प्रभावित स्थान को इस पानी में तकरीबन 15 मिनट के लिए डुबा कर रखें। एक हफ्ते में इस प्रक्रिया को दो से तीन बार कर सकते हैं। लेकिन हृदय से संबंधित, शुगर या उच्च रक्तचाप (high blood pressure) की समस्या से पीड़ित व्यक्ति इस विधि को न करें।
  • गर्म और ठंडा सेक (Hot and cold fomentation) गर्म पानी से नहाने से मांसपेशियों की सिकाई होती है और उन्हें आराम भी मिलता है। इस तरह से मांसपेशियों की अकड़न भी दूर होती है। लेकिन इसके उलट यदि सूजन महसूस हो रही हो तो बर्फ के टुकड़ों को पतले कपड़े में लपेटकर उससे सिकाई करनी चाहिए।
  • मैग्नीशियम युक्त खाना (Magnesium rich food) मैग्नीशियम की कम मात्रा से भी मांसपेशियों में दर्द और खिंचाव हो सकता है। इसके लिए खाने में कद्दू के बीज (pumpkin seeds), काली बीन्स (black beans), सूरजमुखी के बीज (sunflower seeds), बादाम और काजू को अपने आहार में शामिल करना चाहिए। जिससे शरीर को प्रचुर मात्रा में मैग्नीशियम मिल सके।
  • सेब का सिरका (Apple cider vinegar) सेब के सिरके की कुछ मात्रा एक गिलास पानी में मिलाकर पीने से मसल्स के दर्द से राहत मिलती है। इसके अलावा यदि इस तरह पीना कठिन लगे तो एक गिलास पानी में दो चम्मच सिरका, एक चम्मच शहद और कुछ पत्तियां पुदीने की मिलाकर भी पी जा सकती हैं।
  • ऑयल (Oil) मसल पेन में राहत के लिए कैमोमाइल, पेपरमिंट, लेवेंडर आदि तेल में एक या दो चम्मच, नारियल या ऑलिव ऑयल मिलाकर प्रभावित स्थान पर लगाना चाहिए।
  • चेरी जूस (Cherry juice) मसल पेन से राहत के लिए चेरी जूस भी पीना चाहिए। चेरी जूस पीने से मसल्स का खिंचाव कम होता है साथ ही यह मांसपेशियों को राहत भी देता है।
  • मसाज (Massage) मसाज करने से शरीर का रक्तसंचार बेहतर होता है जो कि दर्द को तेजी से ठीक करने में मदद करता है। यदि मसाज करने के लिए अच्छे तेलों का प्रयोग किया जाए तो असर दोगुना हो जाता है।
  • मिर्च में मौजूद कैप्सेसिन (capsaicin) भी दर्द की खास दवा है। बाजार में मिर्च से तैयार कई तरह की दर्द निवारक क्रीम मिलती हैं, लेकिन इन्हें आप घर भी तैयार कर सकते हैं। इसके लिए नारियल या जैतून के तेल को गरम करके इसमें एक बड़ा चम्मच लाल मिर्च मिलाकर इसे ठंडा करें। इसके बाद इसमें एलोवेरा जेल मिलाएं। इस तरह से तैयार उत्पाद को यदि प्रभावित स्थान पर लगाकर हल्के हाथ से मालिश की जाए तो बेहद आराम मिलता है।
  • आराम (Rest) कई बार कुछ न करके सिर्फ आराम करना भी शरीर को बहुत लाभ दे सकता है। यदि शरीर में अकड़न महसूस हो तो कम से कम दो दिन आपको शरीर को पूरी तरह आराम देना चाहिए। इससे शरीर हल्का महसूस करता है और तनाव कम होता है जिसका सीधा असर मांसपेशियों पर भी पड़ता है।

गला बैठना और उसका इलाज,Home Remedies for Hoarseness In Hindi,

इस रोग में रोगी का गला बैठ जाता है जिसके कारण रोगी को बोलने में परेशानी होने लगती है तथा जब व्यक्ति बोलता है तो उसकी आवाज साफ नहीं निकलती है तथा उसकी आवाज बैठी-बैठी सी लगती है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि स्वर नली के स्नायुओं पर किसी प्रकार के अनावश्यक दबाव पड़ने के कारण वे निर्बल पड़ जाती हैं। इस रोग के कारण रोगी की आवाज भारी होने लगती है तथा गले में खुश्की हो जाती है और कभी-कभी रोगी को सूखी खांसी और सांस लेने में परेशानी होने लगती है।

गला बैठने के कारण :- Causes

  • अधिक गाना गाने, चीखने-चिल्लाने तथा जोर-जोर से भाषण देने से रोगी का गला बैठ जाता है।
  • ठंड लगने तथा सीलनयुक्त स्थान पर रहने के कारण गला बैठ सकता है।
  • ठंडी चीजों का भोजन में अधिक प्रयोग करने के कारण भी यह रोग सकता है।
  • शरीर के अन्दर किसी तरह का दूषित द्रव्य जमा हो जाने पर जब यह दूषित द्रव्य किसी तरह से हलक तक पहुंच जाता है तो गला बैठ जाता है।

गला बैठने का प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार ,गला बैठने पर क्या करें,

  • गला बैठने के रोग का उपचार करने के लिए सबसे पहले रोगी व्यक्ति को अपने पेड़ू पर गीली मिट्टी की पट्टी से लेप करना चाहिए तथा इसके बाद एनिमा क्रिया का प्रयोग करके पेट को साफ करना चाहिए। 
  • गला बैठने के रोग से पीड़ित रोगी को सुबह तथा शाम के समय में अपने गले के चारों तरफ गीले कपड़े या मिट्टी की गीली पट्टी का लेप करना चाहिए। 
  • काली मिर्च - यदि सर्दी जुखाम के कारण आपका गला बैठ गया है तो रोजाना सोने से पहले तीन से चार काली मिर्च और उतनी ही मात्र में मिश्री को एक साथ चबाने से बैठ गला खुल जाता है |
  • हल्दी - यदि tonsil के कारण आपका गला बैठ गया है तो एक गिलास गर्म दूध में एक चमच हल्दी पाउडर मिलाकर सोने से पहले पीने से tonsil एक से दो दिन में ठीक हो जाता है जिस कारण बैठा हुआ गला भी खुल जाता है |
  • रोगी व्यक्ति को अपने गले, छाती तथा कंधे पर बारी-बारी से गर्म या ठंडा सेंक करना चाहिए तथा इसके दूसरे दिन उष्णपाद स्नान (गर्म पानी से पैरों को धोना) करना चाहिए। 
  • रोगी व्यक्ति को गर्म पानी में हल्का सा नमक मिलाकर उस पानी से गरारे करने चाहिए और सुबह तथा शाम के समय में एक-एक गिलास नमक मिला हुआ गर्म पानी पीना चाहिए। 
  • गला बैठना रोग से पीड़ित रोगी को 1 सप्ताह तक चोकरयुक्त रोटी तथा उबली-सब्जी खानी चाहिए। 
  • इस रोग से पीड़ित रोगी को फल और दूध का अधिक सेवन करना चाहिए जिसके फलस्वरूप यह रोग ठीक हो जाता है। 
  • रोगी व्यक्ति को पानी में नींबू का रस मिलाकर दिन में कई बार पीना चाहिए तथा इसके अलावा गहरी नीली बोतल का सूर्यतप्त जल कम से कम 25 मिलीलीटर की मात्रा में दिन में 6 बार पीना चाहिए। इस प्रकार से प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार करने से यह रोग ठीक हो जाता है।
  • गले के रोगों को ठीक करने के लिए सबसे पहले रोगी व्यक्ति को 1-2 दिन फलों के रस को पीकर उपवास रखना चाहिए।
  • अनन्नास, सेब, अंजीर, शहतूत, मेथी, लहसुन तथा पपीता का सेवन अधिक करने से गले के कई प्रकार के रोग ठीक हो जाते हैं।
  • अंगूर का रस पीने से गला बैठने का रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है।
  • यदि गले में खराश हो तो तुलसी और अदरक का रस शहद में मिलाकर चाटने से लाभ होता है।
  • यदि गला बैठा हो या सूज रहा हो तो पानी में नींबू निचोड़कर गरारा करने से बहुत अधिक लाभ मिलता है।
  • फिटकिरी - यदि किसी कारण वश आपके गले में सुजन आ गई हो और उस कारण आपका गला बैठ गया हो तो एक गिलास पानी ले और उसमे 50 ग्राम फिटकिरी को डाल कर दिन में दो से तीन बार गारगल करे | ऐसा करने से गले की खराश दूर हो जाती है और आपके गले को आराम मिलती है | इस प्रक्रिया को दो से तीन दिन करने से आपकी गले की सुजन कम हो जाता है और बैठा हुआ गला ठीक हो जाएगा |
  • चुना - गला बैठने पर सोने से पहले चुने का लेप बना ले और इसे सोने से पहले गले पर लगाए जिससे सुबह तक बैठा गला ठीक हो जाता है
  • मेथी के दानों को पानी में उबाल कर उस पानी से गरारा करने से मुंह के छाले जल्दी ठीक हो जाते हैं।
  • गले के रोगों को ठीक करने के लिए मिट्टी की गर्म पट्टी गले के चारों तरफ लगाकर उपवास रखने तथा एनिमा लेने से बहुत अधिक लाभ मिलता है।
  • यदि भोजन को निगलते समय दर्द हो रहा हो तो सूर्यतप्त नीली बोतल के पानी से गरारा करने से भी रोगी को लाभ होता है।
  • गले के रोग को ठीक करने के लिए गले पर गर्म या ठंडा सेंक करना चाहिए। इसके फलस्वरूप रोगी को बहुत अधिक फायदा मिलता है।
  • गले में दर्द होने पर तुलसी का रस शहद में मिलाकर चाटने से गले में दर्द होना बंद हो जाता है।
  • अंजीर को पानी में उबालकर उस पानी से गरारा करने से गला बैठने का रोग ठीक हो जाता है।
  • त्रिफला का चूर्ण फांककर दूध में मिलाकर पीने से गले के कई रोग ठीक हो जाते हैं।
  • यदि गले में कोई रोग हो जाए तो अंगूठे और तर्जनी उंगली के भाग पर मालिश करने से गले का रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है।
  • एक गिलास पानी में आधा चम्मच चाय की पत्ती उबालकर उस पानी से गरारा करने से रोगी व्यक्ति को बहुत अधिक लाभ मिलता है। इस क्रिया को दिन में 3-4 बार करने से यह रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है। इस प्रकार से उपचार करने से गले में दर्द तथा सूजन भी ठीक हो जाती है।
  • एक चम्मच लहसुन के रस को एक गिलास पानी में डालकर उस पानी को उबाल लें। इस पानी से दिन में 3-4 बार गरारा करने से गले के रोगों में बहुत अधिक लाभ मिलता है।
  • गले के रोगों को ठीक करने के लिए कई प्रकार के आसन भी हैं जिन्हें करने से गले के रोग ठीक हो जाते हैं ये आसन इस प्रकार हैं- सूर्य नमस्कार तथा सिंहासन। 

Saturday, February 11, 2017

हाथ और पैर में झुनझुनी,Home Remedies for Numb Hands and Feet In Hindi,

हाथ और पैर में झुनझुनी,Home Remedies for Numb Hands and Feet In Hindi,
शरीर का कोई अंग यदि किसी दबाव में ज्यादा समय तक रहता है,तो वह सुन्न हो जाता है.वस्तुतः यह दबाव हाथ या पैर की नसों पर पड़ता है, ये नसें कई एक कोशीय फाइबर से बनी होती है. प्रत्येक एक कोशीय फाइबर अलग-अलग संवेदनाओं को मस्तिष्क तक पहुँचाने का कार्य करता है.इन फाइबरों की मोटाई भी कम-ज्यादा होती है.इसका कारण माइलिन नामक श्वेत रंग के पदार्थ द्वारा बनाई गई झिल्ली है.इन पर दबाव पड़ने से मस्तिस्क तक नसों द्वारा पर्याप्त मात्रा में आक्सीजन और रक्त का संचरण नहीं हो पता है. मस्तिष्क तक उस अंग के बारे में पहुंचने वाली जानकारी रक्त और आक्सीजन के अभाव में अवरूद्ध हो जाती है.इस कारण वहां संवेदना महसूस नहीं हो पाती और वह अंग सुन्न हो जाता है.

जब उस अंग पर से दबाव हट जाता है तब रक्त और आक्सीजन का संचरण नियमित हो जाता है और पुनः उस अंग में संवेदनशीलता लौट आती है.

हाथ और पैर में झुनझुनी के लक्षण 

इस रोग में रक्त धमनियों की भीतरी दीवारों पर वसा जम जाती है। ये हाथ-पांवों के ऊतकों में रक्त प्रवाह को रोकता है। इस रोग के प्राथमिक चरण में चलने या सीढ़ियां चढ़ने पर पैरों और कूल्हों थकाना या दर्द महसूस होता है। अन्य लक्षण होते हैं दर्द, सुन्न होना, पैर की पेशियों में भारीपन। शारीरिक काम करते समय मांसपेशियों को अधिक रक्त प्रवाह चाहिए होता है। 

मधुमेह या डायबिटीज मेलीटस :यदि आपको मधुमेह है तो रक्त में शर्करा की मात्रा को नियंत्रण में रखें,क्या है 
यह बीमारी उन लोगों में ज्यादा होती है, जो हाइपरटेंशन, डायबिटीज, उच्च रक्तचाप, हाईकॉलेस्ट्रॉल के मरीज होते हैं या उनके खून में फैट या लिपिड की मात्रा ज्यादा होती है। साथ ही धूम्रपान ज्यादा करने वालों को भी ये समस्या होती है। इसके अलावा, खून का थक्का जमने के कारण रक्त-शिराएं ब्लॉक हो जाती हैं। 

हाथ और पैर में झुनझुनी का घरेलू उपचार ,

गर्म पानी का सेंक

गर्म पानी का सेंक-सबसे पहले प्रभावित जगह पर गर्म पानी की बोतल से सेंक रखें। इससे वहां की ब्लड सप्लाई बढ़ जाएगी। इससे मासपेशियां और नसें रिलेक्स होंगी। एक साफ कपड़े को गर्म पानी में 5 मिनट के लिए भिगोएं और फिर उससे प्रभावित जगह को सेंकें। आप चाहें तो गर्म पानी से स्नान भी कर सकती हैं।

गर्म तेल से करें मसाज

हाथ पैरों के सुन्न पड़ने पर आप जैतून या फिर सरसों के तेल को हल्का गर्म करके उससे हाथ पैरों की मालिश करें. ऐसा करने से सुन्न पड़े अंगों की नसें खुलती हैं और प्रभावित हिस्से में ब्लड सर्कुलेशन बढ़ता है.  प्रभावित अंगों के मसाज से आप अपनी इस परेशानी से काफी हद तक राहत पा सकते हैं.

प्रभावित जगह पर मसाज करे।

हाथ या पैर में सुन्‍नपन आने पर मसाज इस समस्‍या से निपटने का सबसे आसान और सरल तरीका है। यह ब्‍लड सर्कुलेशन को बढ़ाता है, जिससे सुन्नता में कमी आती है। इसके अलावा यह मसल्‍स और नसों को प्रोत्‍साहित कर, समग्र कामकाज में सुधार करता है। अपने हाथों में गर्म जैतून, नारियल या सरसों के तेल लेकर इसे सुन्न हिस्‍से में लगाकर 5 मिनट के लिए सर्कुलर मोशन में अपनी उंगालियों से मसाज करें। जरूरत पड़ने पर इस उपाय को दोहराये।

एक्सरसाइज करें-

व्यायाम करने से शरीर में ब्लड र्स्कुलेशन होता है और वहां पर आक्सीजन की मात्रा बढ़ती है। रोजाना हाथ और पैरों का 15 मिनट व्यायाम करना चाहिए। इसके अलावा हफ्ते में 5 दिन के लिए 30 मिनट एरोबिक्स करें, जिससे आप हमेशा स्वस्थ बने रहें।एक्सरसाइज शरीर के विभिन्न अंगों में ब्लड सर्कुलेशन और ऑक्सीजन में सुधार करता है, जिससे हाथ और पैर सहित शरीर के किसी भी अंग में सुन्नपन, झनझनाहट को रोकने में मदद मिलती है। इसके अलावा नियमित रूप एक्सरसाइज गतिशीलता में सुधार और कई स्वास्थ्य समस्याओं से बचाता है।

मैग्नी शियम का सेवन जरूर करें

हरी पत्तेीदार सब्जिेयां, मेवे, बीज, ओटमील, पीनट बटर, ठंडे पानी की मछलियां, सोया बीन, अवाकाडो, केला, डार्क चॉकलेट और लो फैट दही आदि जरूर खाएं। आप रोजाना मैग्नीlशियम 350 एम जी की सपलीमेंट भी ले सकते हैं।

हल्दी का उपयोग 

हल्दी-हल्दी में मौजूद कुरकुर्मीन नाम का तत्व पूरे शरीर में ब्लड सर्कुलेशन में सुधार करने में मदद करता है। इसके अलावा, इसमें मौजूद एंटी-इंफ्लेमेंटरी गुण प्रभावित हिस्से में दर्द और परेशानी कम करने में मदद करता है। समस्या होने पर एक गिलास दूध में आधा चम्मच हल्दी मिक्स करके हल्की आंच पर पकाएं। फिर इसमें थोड़ा सा शहद मिलाकर दिन में एक बार पीने से ब्लड सर्कुलेशन में सुधार होता है। आप हल्दी और पानी से बने पेस्ट से प्रभावित हिस्से पर मसाज भी कर सकते हैं।

खूब खाएं Vitamin B फूड

अगर हाथ-पैरों में जन्न-जन्नाशहट सी होती है तो अपने आहार में ढेर सारे विटामिन बी, बी6 और बी12 को शामिल करें। इनके कमी से भी हाथ, पैरों, बाजुओं और उंगलियों में सुन्न पैदा हो जाती है। आपको अपने आहार में अंडे, अवाकाडो, मीट, केला, बींस, मछली, ओटमील, दूध, चीज़, दही, मेवे, बीज और फल शामिल करने चाहिये।

दालचीनी का उपयोग

दालचीनी का उपयोग करें-दालचीनी में केमिकल और न्यूट्रिएंट्स होते हैं जो हाथ और पैरों में ब्लड फ्लो को बढ़ाते हैं। एक्सपर्ट बताते हैं रोजाना 2-4 ग्राम दालचीनी पाउडर को लेने से ब्लड सर्कुलेशन बढ़ता है। इसको लेने का अच्छा तरीका है कि एक गिलास गर्म पानी में 1 चम्मच दालचीनी पाउडर मिलाएं और दिन में एक बार पिएं। दूसरा तरीका है कि 1 चम्मच दालचीनी और शहद मिला कर सुबह कुछ दिनों तक सेवन करें।

औषिधि के रूप में सिर्फ "" नवायस लौह वटी "" २ -२ गोली दूध के साथ सुबह शाम सेवन करे

Thursday, December 22, 2016

फाइलेरिया के कारण लक्षण और उसके घरेलू उपाय,What is Filaria in Hindi,

फाईलेरिया रोग का इलाज संभव है। अगर इसका इलाज प्रारंम्भिक अवस्था में हो जाय तो संक्रमण को फैलने से रोका जा सकता है। फाइलेरिया रोग में अकसर हाथ या पैर बहुत ही ज़्यादा सूज जाते हैं। इसलिए इस रोग को हाथी पांव भी कहते हैं। पर फाइलेरिया रोग से पीड़ित हर व्यक्ति के हाथ या पैर नहीं सूजते। यह बीमारी पूर्वी भारत, मालाबार और महाराष्ट्र के पूर्वी इलाकों में बहुत अधिक फैली हुई है।
  • यह कृमिवाली बीमारी है। यह कृमि लसिका तंत्र की नलियों में होते हैं और उन्हें बंद कर देते हैं। क्यूलैक्स मच्छर के काटने से बहुत छोटे आकार के कृमि शरीर में प्रवेश करते हैं। मलेरिया के कीड़ों की तरह यह कीड़े मनुष्यों और मच्छरों दोनों में छूत पैदा करते हैं फाइलेरिया (Lymphatic Filariasis) एक परजीवीजन्य संक्रामक बीमारी है जो धागे जैसे कृमियों से होती है। वैश्विक स्तर पर इसे एक उपेक्षित उष्णकटिबंधीय बीमारी (Neglected Tropical Disease) माना जाता है। 
  • फाइलेरिया दुनिया भर के उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय देशों में एक गंभीर स्वास्थ्य समस्या है। जिसमें भारत भी शामिल है। विश्व में लगभग 1.3 अरब लोगों को इस बीमारी के संक्रमण का खतरा है और लगभग 12 करोड़ लोग इससे वर्तमान में संक्रमित हो चुके हैं, जिनमें से लगभग 4 करोड़ लोग इस बीमारी की वजह से किसी विकृति का शिकार हो गए हैं या अक्षम हो चुके हैं।
  • फाइलेरिया 2.5 करोड़ से ज्यादा पुरुषों को जननांग के विकार और 1.5 करोड़ से ज्यादा लोगों को सूजन से प्रभावित कर चुका है। हाथीपांव (Elephantiasis) फाइलेरिया का सबसे सामान्य लक्षण है जिसमें शोफ (Oedema) के साथ चमड़ी तथा उसके नीचे के ऊतक मोटे हो जाते हैं।

क्या हैं फाइलेरिया के लक्षण,filaria symptoms

इस तथ्य का अभी तक सटीक आकलन नहीं किया जा सका है कि संक्रमण के बाद फाइलेरिया के लक्षण प्रकट होने में कितना समय लगता है। हालांकि मच्छर के काटने के 16-18 महीनों के पश्चात बीमारी के लक्षण प्रकट होते हैं। फाइलेरिया के ज्यादातार लक्षण और संकेत वयस्क कृमि के लसीका तंत्र में प्रवेश के कारण पैदा होते हैं
  • कृमि द्वारा ऊतकों को नुकसान पहुंचाने से लसीका द्रव का बहाव बाधित होता है जिससे सूजन, घाव और संक्रमण पैदा होते हैं। पैर और पेड़ू सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाले अंग हैं। फाइलेरिया का संक्रमण सामान्य शारीरिक कमजोरी, सिरदर्द, मिचली, हल्के बुखार और बार-बार खुजली के रूप में प्रकट होता है।
  • फाइलेरिया कभी-कभार ही जानलेवा साबित होता है, हालांकि इससे बार-बार संक्रमण, बुखार, लसीका तंत्र में गंभीर सूजन और फेफड़ों की बीमारी ‘ट्रॉपिकल पल्मोनरी इओसिनोफीलिया (Tropical Pulmonary Eosinophilia) हो जाती है। ट्रॉपिकल पल्मोनरी इओसिनोफीलिया के लक्षणों में खांसी, सांस लेने में परेशानी और सांस लेने में घरघराहट की आवाज होती है। लगभग 5 प्रतिशत मामलों में पैरों में सूजन आ जाती है जिसे फ़ीलपांव अथवा हाथीपांव कहते हैं। फाइलेरिया से गंभीर विकृति, चलने-फिरने में परेशानी और लंबी अवधि की विकलांगता हो सकती है।
  • फाइलेरिया के कारण हाइड्रोसील (Hydrocoele) भी हो सकता है। मरीज के वृषणकोष (Scrotum) में सूजन भी आ सकती है जिसे ‘फाइलेरियल स्क्रोटम’ (Filarial scrotum) कहा जाता है। कुछ मरीजों में मूत्र का रंग दूधिया हो जाता है। महिलाओं में वक्ष या बाह्य जननांग भी प्रभावित होते हैं। कुछ मामलों में पेरिकार्डियल स्पेस (हृदय और उसके झिल्लीदार आवरण के बीच की जगह) में भी द्रव जमा हो जाता है।

फाइलेरिया के कौन से कारक जीव

फाइलेरिया, फाइलेरियोडिडिया (Filariodidea) कुल के नेमैटोडों (गोलकृमि) के संक्रमण से होता है। तीन प्रकार के कृमि इस बीमारी को जन्म देते हैं। ये हैं वुचिरेरिया बैंक्राफ्टाई (Wuchereria bancrofti), ब्रुजिया मलाई (Brugia malayi) औरब्रुजिया टिमोरीई (Brugia timori)। वुचिरेरिया बैंक्राफ्टाई इस बीमारी का सबसे सामान्य कारक है जो पूरे विश्व में पाया जाता है।
  • ब्रुजिया मलाई दक्षिण-पश्चिम भारत, चीन, इंडोनेशिया, मलेशिया, दक्षिण कोरिया, फिलिपींस और वियतनाम में पाया जाता है जबकि ब्रुजिया टिमोराई सिर्फ इंडोनेशिया तक ही सीमित है। 
  • वुचिरेरिया बैंक्राफ्टाई में नर कृमि 40 मिलीमीटर लंबा होता है जबकि मादा की लंबाई लगभग 50-100 मिलीमीटर होती है।
  • फाइलेरिया भारत में एक प्रमुख स्वास्थ्य समस्या है। यह संक्रामक बीमारी देश के राज्यों उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश, ओडिशा, तमिलनाडु, गुजरात, केरल एवं केन्द्र शासित प्रदेशों लक्षद्वीप और अंडमान निकोबार में स्थाई रूप से उभरती रहती है। 
  • भारत में मुख्य तौर पर फाइलेरिया के दो प्रकार के संक्रमण होते हैं, एक वुचिरेरिया बैंक्राफ्टाई से और दूसरा ब्रुजिया मलाई से। वुचिरेरिया बैंक्राफ्टाई के संक्रमण से होने वाला बैंक्रोफ्टियन फाइलेरिया (Bancroftian filaria) भारत में फाइलेरिया के कुल मामलों का लगभग 98 प्रतिशत होता है

कैसे फैलता है फाइलेरिया

  • फाइलेरिया मच्छरों से फैलता है जो परजीवी कृमियों के लिए रोगवाहक का काम करते हैं। 
  • इस परजीवी के लिए मनुष्य मुख्य पोषक है जबकि मच्छर इसके वाहक और मध्यस्थ पोषक हैं। 
  • कृमि प्रभावित क्षेत्रों से लोगों का रोजगार की तलाश में बाहर जाना, शहरीकरण, औद्योगिकीकरण, अज्ञानता, आवासीय सुविधाओं की कमी और स्वच्छता की अपर्याप्त स्थिति से यह संक्रमण फैलता है। 
  • संक्रमण के बाद कृमि के लार्वा संक्रमित व्यक्ति की रक्तधारा में बहते रहते हैं जबकि वयस्क कृमि मानव लसीका तंत्र में जगह बना लेता है। एक वयस्क कृमि की आयु सात वर्ष तक हो सकती है।
  •  संक्रमित मच्‍छर के काटने से इसके कीड़े फैलते है। जब मनुष्‍य बच्‍चा होता है तो आम तौर पर संक्रमण आरंभ हो जाता है। तीन प्रकार के कीड़े होते है जिनके कारण बीमारी फैलती है: Wuchereria bancrofti, Brugia malayi, और Brugia timori. Wuchereria bancrofti यह सबसे सामान्‍य है। यह कीड़ा lymphatic system को नुकसान पहुंचाता है।
  •  रात के समय एकत्रित किए गए खून को, एक प्रकार के सूक्ष्‍मदर्शी के द्वारा देखने पर इस बीमारी का पता चलता है। खून को thick smear के रूप में और Giemsa के साथ दाग के रूप में होना चाहिए।. बीमारी के विरूद्ध एंटीबाडियों हेतु खून की जांच भी की जा सकती है।
  • यह शोथ न्यूनाधिक होता रहता है, परंतु जब ये कृमि अंदर ही अंदर मर जाते हैं, तब लसीकावाहिनियों का मार्ग सदा के लिए बंद हो जाता है और उस स्थान की त्वचा मोटी तथा कड़ी हो जाती है। लसीका वाहिनियों के मार्ग बंद हो जाने से यदि अंग फूल जाएँ, तो कोई भी औषध ऐसी नहीं है जो अवरुद्ध लसीकामार्ग को खोल सके। 
  • कभी कभी किसी किसी रोगी में शल्यकर्म द्वारा लसीकावाहिनी का नया मार्ग बनाया जा सकता है। इस रोग के समस्त लक्षण फाइलेरिया के उग्र प्रकोप के समान होते हैं।

फाइलेरिया का घरेलू इलाज

इलाज बीमारी की शुरुआती अवस्था में ही शुरु हो जाना चाहिए। याद रखना चाहिए कि हाथों या पैरों की सूजन ठीक करने के लिए हमारे पास कोई भी दवाई नहीं है। डाईइथाइल – कार्बामाज़ीन (DEC) फाइलेरिया की एक दवा है। इसे दो हफ्तों दिया जाना चाहिए। इस दवा से सिर में दर्द, मितली, उल्टी जैसी प्रतिक्रियाएं हो सकती हैं। कभी कभी इससे एलर्जी भी हो जाती है। आप इसके बारे में और अधिक दवाइयों वाले अध्याय में पढ़ सकते हैं।

फाइलेरिया पर नियंत्रण या रोकथाम phayaleriya-check फायलेरिया जॉंच के लिये खून का नमूना रात में लेना पडता है इस बीमारी कृमि के कई एक वाहक इलाज के लिए नहीं पहुँचते। इसलिए संक्रमणग्रस्त इलाकों में सभी की जांच ज़रूरी है। ऐसा न होने पर बीमारी फैलती जाती है। जिन क्षेत्रों में फाइलेरिया की समस्या हो वहॉं खास सर्वे किए जाने ज़रूरी होते हैं। फाइलेरिया के नियंत्रण के लिए रात को खून के आलेप के नमूने इकट्ठे करना, रोकथाम के लिये दवा प्रयोग और बीएचसी छिडकाकर मच्छरों पर नियंत्रण करना जैसे कदम उठाना ज़रूरी है। जिन क्षेत्रों में फाइलेरिया की बीमारी ज़्यादा होती है वहॉं नमक में DEC दवा मिलाना ठीक रहता है। इससे यह सुनिश्चित हो जाता है कि हर व्यक्ति को यह दवा मिल जाए (कम मात्रा में) और इससे सूक्ष्म फाइलेरिया कृमि को मारा जा सकता है।

ये सूक्ष्म फाइलेरिया कृमि खून में घूमते रहते हैं। ऐसा खासकर रात को होता है। क्यूलैक्स मच्छर जब खून चूसता है तो वो इन सूक्ष्म फाइलेरिया को अपने अंदर ले लेता है। और संक्रमण पैदा करने वाले लार्वा के रुप में इनका विकास 10 से 15 दिनों के अंदर होता है। इस अवस्था में मच्छर बीमारी पैदा करने वाला होता है। इस तरह यह चक्र चलता रहता है।

Monday, November 7, 2016

पेट में दर्द का घरेलू इलाज,Home Remedies for Stomach Pain in Hindi,Pet Dard ke Gharelu Upay

पेट में दर्द होना एक आम समस्या है ,जिससे लगभग सभी व्यक्तियों को जीवन में बार बार सामना करना पड़ता है | इनके कई अलग अलग काऱण हो सकते है । पेट दर्द के मुख्य कारण कब्ज का होना, ज्यादा गैस बनना, अपच, विषाक्त भोजन सेवन करना आदि सकता हैं।यहाँ पर हम कुछ आसान से उपाय बता रहे है जिसको करके आप पेट दर्द में आराम प्राप्त कर सकते है ।

पेट दर्द के कारण | Causes of Stomach Pain in Hindi | Pet Dard ke Karan

  • पेट में कब्ज की समस्या होने पर
  • भोजन का ठीक से न पचना
  • अनियमित खानपान
  • जंक फ़ूड का अधिक सेवन
  • एसिडिटी होने पर
  • पेट में अत्यधिक गैस बनने पर

पेट में दर्द का घरेलू इलाज,Home Remedies for Stomach Pain in Hindi

  • पेट दर्द मे हींग बहुत ही लाभकारी है। 5 ग्राम हींग थोडे पानी में पीसकर पेस्ट बनाएं। इसे नाभी पर और उसके आस पास लगायें फिर क़ुछ देर लेटे रहें। इससे पेट की गैस निकल जायेगी और दर्द में राहत मिलेगी
  • जीरा पेट दर्द मे बहुत हि लाभदायक है । जीरा को तवे पर भून ले । 2-3 ग्राम की मात्रा गरम पानी के साथ दिन मे 3-4 बार लें या वैसे ही चबाकर खाये शीघ्र लाभ प्राप्त होता है।
  • 10 ग्राम तुलसी का रस पीने से पेट की मरोड़ व दर्द जल्दी ही ठीक होता है।
  • त्रिफला का 100 ग्राम चूर्ण में 75 ग्राम चीनी मिलालें इस चुर्ण का 5 ग्राम की मात्रा में दिन में 2 -3 बार
  • पानी के साथ सेवन करें। इससे पेट की सभी बीमारियां समाप्त होती हैं।
  • सूखा अदरक को मुहं मे चूसने से पेट दर्द में तुरन्त राहत मिलती है।
  • पेट दर्द में पानी में थोडा सा मीठा सोडा डालकर पीने से फ़ायदा होता है।
  • बिना दूध की चाय पीने से भी पेट दर्द में आराम मेहसूस होता हैं।
  • अजवाईन तवे पर भून लें। इसको काला नमक के साथ मिलाकर 2-3 ग्राम गरम पानी के साथ दिन में 3 बार लेने से पेट के दर्द में शीघ्र आराम मिलता है।
  • एक चम्मच अदरक के रस में 2 चम्मच नींबू का रस और थोडी सी चीनी मिलाकर दिन मे 3 बार लेने से भी पेट दर्द में आराम मिलता है।
  • किसी भी पेट दर्द में केला खाना लाभकारी होता है। केला एक पोषक आहार होता है। केले का सेवन से पेट दर्द में शीघ्र आराम मिलता है। नींबू के रस में काला नमक, जीरा, अजवायन चूर्ण मिलाकर दिन में तीन चार बार लेने से पेट दर्द से आराम मिलता है।
  • हरा धनिया का रस एक चम्मच शुद्ध घी मे मिलाकर लेने से पेट के दर्द में शीघ्र आराम मिलता है।
  • अनार पेट दर्द मे बहुत लाभदायक माना गया है। अनार के बीज थोडी मात्रा में नमक और काली मिर्च के साथ दिन में दो तीन बार लें।
  • मूली की चटनी,अचार, सब्जी या मूली पर नमक, काली मिर्च डालकर खाने से पेट के सभी रोग दूर होते है।
  • चौलाई की सब्जी बनाकर खाने से पेट की सभी बीमारियां समाप्त होती है।
  • सौंठ का 1 चम्मच चूर्ण और सेंधा नमक को एक गिलास पानी में गर्म करके पीने से पेट दर्द खत्म हो जाता है। इसबगोल को दूध के साथ रात को सोते वक्त लेते रहने से पेट के दर्द में आराम मिलता है । प्याज को आग में गर्म करके रस निकाल लें और इस रस में नमक मिलाकर पीएं। इससे भी पेट का दर्द ठीक हो जाता है
  • दो चम्मच ग्राम सौंफ़ रात भर एक गिलास पानी में गलाएं इसे सुबह खाली पेट छानकर पीयें पेंट दर्द मे आराम मिलता है ।

Thursday, November 3, 2016

वेरीकोस वेन्स.नसों का फूलना,Natural Treatment for Varicose Veins in Hindi

जब यह रोग किसी व्यक्ति को हो जाता है तो उसके शरीर की शिराएं (नसें) फैलकर लंबी और मोटी हो जाती है। यह शिराएं (नसें) शरीर की किसी भाग की हो सकती है जैसे- मलाशय शिराएं, वृषण शिराएं तथा ग्रासनली शिराएं। लेकिन यह रोग अधिकतर पैरों को प्रभावित करता है जिसके कारण पैरों की शिराएं लंबी तथा मोटी हो जाती हैं। इस रोग का शिकार अधिकतर महिलाएं होती हैं और इस रोग में रोगी का दाहिना पैर, बाएं पैर की अपेक्षा अधिक प्रभावित होता है।
वेरीकोज़ वेन अर्थात पैरों की पिण्ड़लियों के पीछे नसो का गुच्छा बन जाना, इससे निजात पाने का चमत्कारी घरेलु उपाय वेरीकोज़ वेन अर्थात पैरों की पिण्ड़लियों के पीछे नसो का गुच्छा बन जाना जो देखने में तो बहुत खराब लगता ही है साथ ही साथ रोगी को पैरों में खिंचाव और दर्द की भी अनूभूति देता है

वेरिकोस वेन्स रोग होने का कारण 

  • ये शिराएं वह रक्त वाहिकाएं होती है जो रक्त (खून) को हृदय में वापस लाती हैं। इन शिराओं में वॉल्व लगे होते हैं, जिनसे रक्त का एक ही दिशा में संचारण होता है। जब ये शिराऐं फैल जाती है तो इसके वॉल्व अपना कार्य करना बंद कर देते हैं, 
  • जिसके कारण रक्त (खून) उपास्थि शिराओं में जमा होकर, टांग के ऊतकों के बीच में जमने लगता है, जिसके कारण उस भाग पर सूजन हो जाती है और आगे चलकर त्वचा के रंग में परिवर्तन होने लगता है। जिसके कारण रोगी व्यक्ति के शरीर में क्षय, एक्जीमा, खून की कमी आदि लक्षण दिखाई पड़ने लगते हैं।

वेरिकोस वेन्स रोग का लक्षण

  • इस रोग के हो जाने पर रोगी व्यक्ति के पैरों में दर्द के साथ थकान तथा भारीपन महसूस होने लगता है
  • रोगी के टखने में सूजन हो जाती है। रात के समय में रोगी के पैरों में ऐंठन होने लगती है। 
  • इस रोग से पीड़ित रोगी की त्वचा का रंग बदलने लगता है। इस रोग के कारण स्टैटिस डर्मेटाइटिस तथा शरीर के नीचे के अंगों में सेल्युलाइटिस रोग हो जाता है।
  • शारीरिक श्रम की कमी
  • अचानक से शरीर में होने वाले हार्मोन परिवर्तन
  • उम्र का बढ़ना
  • आनुवांशिक
  • वेरिकोस वेन्स रोग उन व्यक्तियों को हो जाता है जो अधिक देर तक खड़े होकर या बैठकर काम करते हैं।
  • वरिकोस वेन्स रोग उन व्यक्तियों को भी हो जाता है तो अधिक वजन उठाने का कार्य करते हैं तथा अधिक वजन वाले व्यक्तियों और महिलाओं को भी वेरिकोस वेन्स रोग हो जाता है।

    वेरिकोस वेन्स रोग होने पर प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार

    • वेरिकोस वेन्स रोग से पीड़ित रोगी को अधिक वजन उठाने का कार्य नहीं करना चाहिए क्योंकि इससे इस रोग का प्रभाव और अधिक बढ़ सकता है।
    • यदि वेरिकोस वेन्स रोग से पीड़ित रोगी का वजन अधिक है तो उसे अपना वजन कम करना चाहिए ताकि यह रोग जल्दी ठीक हो सके।
    • रोगी व्यक्ति को लंबे समय तक बैठने तथा खड़े रहने का कार्य नहीं करना चाहिए क्योंकि इससे रोग का प्रभाव और बढ़ सकता है।
    • वेरिकोस वेन्स रोग से पीड़ित रोगी का उपचार करने के लिए पानी में इप्सम नमक मिलाकर न्यूट्रल इमर्शन स्नान करना चाहिए। इससे रोगी व्यक्ति को बहुत अधिक आराम मिलता है।
    • रोग से रोग से प्रभावित भाग पर बारी-बारी से गर्म तथा ठण्डी सिंकाई करनी चाहिए ताकि दर्द तथा ऐंठन ठीक हो सके।
    • रोगी व्यक्ति को प्रतिदिन रात के समय में अपनी टांगों पर ठण्डे लपेट का इस्तेमाल करना चाहिए इसके फलस्वरूप यह रोग कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है।
    • यदि रोगी व्यक्ति को अल्सर रोग नहीं है तो उसे अपनी टांगों पर गीली मिट्टी का लेप करना चाहिए। इससे रोगी को बहुत अधिक लाभ मिलता है।
    • वेरिकोस वेन्स रोग से पीड़ित रोगी को कच्चे नारियल का पानी, धनिए का पानी ,जौ का पानी बिना नमक डाले पीना चाहिए। इस प्रकार से उपचार करने से शरीर में अतिरिक्त जल तत्व कम हो जाता है और वेरिकोस वेन्स रोग ठीक हो जाता है।
    • इस रोग से पीड़ित रोगी को सुबह तथा शाम कुछ ऐसे व्यायाम करने चाहिए जिसमें टांग को मोड़ा जा सके तथा सिकुड़ा जा सके। इस प्रकार के व्यायाम से शिराओं में रुका रक्त आगे बढ़ने लगता है और वेरिकोस वेन्स रोग ठीक हो जाता है
    • यदि वेरिकोस वेन्स रोग से पीड़ित रोगी प्रतिदिन प्राकृतिक चिकित्सा से अपने रोग का उपचार करे तो उसका यह रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है।
    आवश्यक सामग्री
    • आधा कप एलोवेरा का गूदा
    • आधा कप कटी हुयी गाजर
    • 10 मि०ली० सेब का सिरका
    बनाने विधी 
    मिक्सी में उपरोक्त तीनों सामानों को एकसाथ ड़ालकर अच्छे से पीसकर पेस्ट तैयार कर लें।
    प्रयोग विधी 
    वेरीकोज वेन वाले हिस्से पर इस पेस्ट को फैलाकर, सूती कपड़े से बहुत ही हल्की पट्टी बाँध दें । अब एक सीधी जगह पर पीठ के बल लेट जायें और पैरों को शरीर के तल से लगभग एक-सवा फुट ऊपर उठाकर किसी सहारे से टिका लें । इस अवस्था में लगभग तीस मिनट तक लेटे रहें । यह प्रयोग रोज तीन बार करना है ।
    ध्यान रखें यह बहुत धीरे ठीक होने वाला रोग है अत: सयंम के साथ इस प्रयोग का पालन करें 

    Alzheimer Disease In Hindi,अल्ज़ाइमर रोग क्या है (What is Alzheimer’s Disease)

    अल्जाइमर रोग(अंग्रेज़ी:Alzheimer's Disease) रोग 'भूलने का रोग' है। इसका नाम अलोइस अल्जाइमर पर रखा गया है, जिन्होंने सबसे पहले इसका विवरण दिया। इस बीमारी के लक्षणों में याददाश्त की कमी होना, निर्णय न ले पाना, बोलने में दिक्कत आना तथा फिर इसकी वजह से सामाजिक और पारिवारिक समस्याओं की गंभीर स्थिति आदि शामिल हैं। रक्तचाप, मधुमेह, आधुनिक जीवनशैली और सर में कई बार चोट लग जाने से इस बीमारी के होने की आशंका बढ़ जाती है। अमूमन 60 वर्ष की उम्र के आसपास होने वाली इस बीमारी का फिलहाल कोई स्थायी इलाज नहीं है।
      • हालांकि बीमारी के शुरूआती दौर में नियमित जांच और इलाज से इस पर काबू पाया जा सकता है। मस्तिष्क के स्त्रायुओं के क्षरण से रोगियों की बौद्धिक क्षमता और व्यावहारिक लक्षणों पर भी असर पड़ता है।
      • हम जैसे-जैसे बूढ़े होते हैं, हमारी सोचने और याद करने की क्षमता भी कमजोर होती है। लेकिन इसका गंभीर होना और हमारे दिमाग के काम करने की क्षमता में गंभीर बदलाव उम्र बढ़ने का सामान्य लक्षण नहीं है।
      • यह इस बात का संकेत है कि हमारे दिमाग की कोशिकाएं मर रही हैं। दिमाग में एक सौ अरब कोशिकाएं (न्यूरान) होती हैं। हरेक कोशिका बहुत सारी अन्य कोशिकाओं से संवाद कर एक नेटवर्क बनाती हैं। इस नेटवर्क का काम विशेष होता है। कुछ सोचती हैं, सीखती हैं और याद रखती हैं। अन्य कोशिकाएं हमें देखने, सुनने, सूंघने आदि में मदद करती हैं। इसके अलावा अन्य कोशिकाएं हमारी मांसपेशियों को चलने का निर्देश देती हैं।
      • अपना काम करने के लिए दिमाग की कोशिकाएं लघु उद्योग की तरह काम करती हैं। वे सप्लाई लेती हैं, ऊर्जा पैदा करती हैं, अंगों का निर्माण करती हैं और बेकार चीजों को बाहर निकालती हैं। कोशिकाएं सूचनाओं को जमा करती हैं और फिर उनका प्रसंस्करण भी करती हैं। शरीर को चलते रहने के लिए समन्वय के साथ बड़ी मात्रा में ऑक्सीजन और ईंधन की जरूरत होती है।
      • अल्जाइमर रोग में कोशिकाओं की उद्योग का हिस्सा काम करना बंद कर देता है, जिससे दूसरे कामों पर भी असर पड़ता है। जैसे-जैसे नुकसान बढ़ता है, कोशिकाओं में काम करने की ताकत कम होती जाती है और अंततः वे मर जाती हैं।

        अल्ज़ाइमर रोग के कारक

        अल्ज़ाइमर रोग किसी को भी हो सकता है। इस का कोई स्पष्ट कारक नहीं मालूम है। उम्र के साथ-साथ अल्ज़ाइमर रोग की संभावना बहुत बढ़ती है उम्र बढ़ने को इस रोग का सबसे प्रमुख कारक माना जाता है

        यदि परिवार में किसी को अल्ज़ाइमर है, तो बच्चों में अल्ज़ाइमर की संभावना ज्यादा होती है। इस आनुवंशिकता को ठीक से समझने के लिए अभी रिसर्च चल रहा है।

         अल्ज़ाइमर रोग के लक्षण

        • यह बढ़नेवाला और खतरनाक दिमागी रोग है।
        • अल्जाइमर से दिमाग की कोशिकाएँ नष्ट हो जाती हैं, जिसके कारण याददाश्त, सोचने की शक्ति और अन्य व्यवहार बदलने लगते हैं। इसका असर सामाजिक जीवन पर पड़ता है।
        • समय बीतने के साथ यह बीमारी बढ़ती है और खतरनाक हो जाती है।
        • यह याददाश्त खोने (डीमेंसिया) का सबसे सामान्य रूप है। अन्य बौद्धिक गतिविधियां भी कम होने लगती हैं, जिससे प्रतिदिन के जीवन पर असर पड़ता है।
        •  जगह और समय क्या है, यह ठीक से मालूम नहीं होना (disorientation) भटकने की समस्या आम है (wandering)
        • साधारण रोज-रोज के काम करने में दिक्कत होना, काम बहुत धीरे-धीर करना या उन में मदद की जरूरत होना (problems in daily activities)
        • ध्यान लगाने में दिक्कत (inability to concentrate)नई चीजें न सीख पाना (problems learning new things)अपनी बात बताने में दिक्कत, और दूसरों की बातें समझने में दिक्कत, भाषा की दिक्कत, लिखने में दिक्कत (communication/ language/ writing  problems)
        • चीजें पहचानने में दिक्कत, चित्रों को पहचान ना पाना, दूरी का अंदाजा ठीक से नहीं लगा पाना (problems related to seeing and recognizing)
        • सोचने में और तर्क करने में दिक्कत, हिसाब करने में दिक्कत, समस्याएँ ना सुलझा पाना,  निर्णय लेने में दिक्कत (problems in thinking and reasoning, difficulties in calculations, decision-making and problem solving)
        • व्यक्तित्व और मूड में बदलाव, जैसे कि दूसरों से दूर रहने लगना, चिड़चिड़ा होना  (personality and mood changes, withdrawal)
          भ्रम होना (delusions)

        अल्ज़ाइमर रोग से बचाव:

        • अल्ज़ाइमर से बचने का कोई पक्का तरीका अब तक मालूम नहीं है। इस पर जोर-शोर से शोध चल रहा है।
        • अब तक की समझ के हिसाब से कुछ चीजें जिन्हें अपनाने से इसकी संभावना कम होगी 
        • स्वस्थ जीवनशैली अपनाना, जैसे कि नियमित व्यायाम और पौष्टिक भोजन (हृदय स्वास्थ्य में इस्तेमाल तरीके अल्ज़ाइमर रोग से बचाव के लिए भी अपना सकते हैं) (adopt a healthy lifestyle, such as regular exercise, nutritious food, and choose heart-healthy options)
        • सक्रिय और सकारात्मक जीवन बिताना, अर्थपूर्ण कम करना (lead an active and positive life, do meaningful activities)
        • अवसाद/ डिप्रेसन से बचना (avoid depression)ऐसे काम करना जिन से मस्तिष्क सक्रिय रहे (keep the brain active)
        • लोगों से मिलना-जुलना, सामाजिक गतिविधियों में भाग लेना (maintain social relationships and activities)
        • कुछ स्वास्थ्य समस्याओं से खास तौर बचना, जैसे कि मधुमेह, उच्च रक्तचाप, उच्च कोलेस्ट्रोल, और हृदय रोग। यह हों तो इन को नियंत्रण में रखना (prevent problems like diabetes, high BP, high cholestrol, and heart disease, or keep them under control)
          तंबाकू सेवन बंद करना, मद्यपान सीमित रखना (stop tobacco consumption, limit alcohol intake)

        याददाश्त कमजोर होने पर ये खाएं-

        • बादाम और ड्राई फ्रूट तो दिमाग तेज करने और याददाश्त बढ़ाने के लिए रामबाण हैं ही इसके अलावा भी कई और सुपरफूड हैं जो आपकी याददाश्त तेज कर सकते हैं.
        • दिमाग को सक्रिय बनाए रखने के लिए एंटीऑक्सिडेंट्स से भरपूर स्ट्रॉबेरी और ब्लूबेरी खाएं. विटामिन ई से भरपूर स्ट्रॉबेरी और ब्लूबेरी खाने से ना सिर्फ तनाव कम होगा बल्कि मानसिक समस्‍याओं से भी निजात मिलेगी.
        • हरी फूलगोभी यानी ब्रोकली का सेवन करने से दिमाग तेज होता है. दरअसल, ब्रोकली में मैग्नीशियम, कैल्शियम, जिंक और फास्फोरस अच्‍छी मात्रा में पाया जाता है जिससे दिमाग तो तेज होता ही है हड्डियां भी मजबूत होती हैं.
        • एक रिसर्च के मुताबिक, यदि बढ़ती उम्र में लोग अपना काम खुद करते हैं तो उन्हें अल्जाइमर रोग होने का खतरा कम होता है. अपने खुद के काम करने से दिमाग सक्रिय होता है और स्मरणशक्ति तेज रहती है.
        • अल्जाइमर के दौरान दिमाग में बढ़ने वाले जहरीले बीटा-एमिलॉयड नामक प्रोटीन के प्रभाव को ग्रीन टी के सेवन से कम किया जा सकता है.
        • अन्य चीजें- हरी पत्तेदार सब्जियां, बींस, साबुत अनाज, मछली, जैतून का तेल और एक गिलास वाइन अल्जाइमर रोग से लड़ने में मदद करती हैं.

        अल्जाइमर रोग के दौरान क्या ना खाएं-

        • अल्जाइमर रोग से बचने के लिए अतिरिक्त कॉपर को डायट में कम कर देना चाहिए. अगर कॉपर डायट में अधिक होगा तो अल्जाइमर रोग का खतरा बढ़ जाता है. 
        • ऐसे में कॉपरयुक्त खाद्य पदार्थों का बहुत सेवन ना करें जैसे- तिल, काजू, सूखे टमाटर, कद्दू, तुलसी, मक्खन, चीज़, फ्राइड फूड, जंकफूड, रेड मीट, पेस्ट्रीज और मीठे का सेवन करने से बचें.
        • याददाश्त बढ़ाने के लिए योग- रोजाना व्यायाम और योग करके अल्जाइमर रोग के प्रभाव को कम किया जा सकता है.
        • मेडिटेशन करने से भूलने की समस्या को कम किया जा सकता है.
        • याददाश्त तेज करने के लिए सर्वांगासन करें.
        • दिमाग तेज करना हो और याददाश्त बनाए रखनी हो तो भुजंगासन करें.
        • एकाग्रता बढ़ाने और दिमाग में रक्त का अच्छी तरह से प्रवाह करने के लिए कपालभाति प्राणायाम करें.

        Friday, May 13, 2016

        फटी एड़ियो का उपचार,Home Remedies for Corns on Feet,Corn Removal,

        शरीर में उष्णता या खुश्की बढ़ जाने से, नंगे पैर चलने-फिरने से, खून की कमी से, तेज गर्मी अथवा तेज ठंड के प्रभाव से तथा धूल-मिट्टी आदि के प्रभाव से पैर की एड़ियां फट जाती हैं.यदि इनकी देखभाल न की जाए तो ये बहुत ज्यादा फट जाती हैं, बहुत दर्द करती हैं, और इनसे खून भी आने लगता है.

        घरेलू इलाज,Crack Heel Treatment in Hindi,Corn Removal,foot callus removal,

          • नमक और तेल -पसीने से तर पैर और अधिक देखभाल के रूप में वे फंगल संक्रमण और अन्य जमी हुई मल और गंदगी के संचय के कारण विकारों से ग्रस्त हैं की जरूरत है। फिर, एक बहुत ही सरल प्रक्रिया है कि आप घर पर कर सकते हैं, समुद्री नमक के आधा कप ले लो और इसे करने के लिए खनिज तेल जोड़ें। अच्छी तरह मिक्स और धीरे अपने पैर रगडें।
          • अमचूर को खाने के तेल में तलकर ठंडा करें. अब इसे छानकर इस तेल की 50 ग्राम मात्रा, मोम 20 ग्राम, सत्यानाशी के बीजों का पाऊडर 10 ग्राम और शुद्ध घी 25 ग्राम. इन सबको अच्छी तरह शीशी में भर लें. सोते समय पैरों को साफ-धो-पौंछकर यह दवा बिवाई में भर दें और ऊपर से मोजे पहनकर सो जाएँ. कुछ ही दिनों में बिवाई दूर हो जाएगी व तलवों की त्वचा साफ, चिकनी एवं साफ हो जाएगी.
          • गुनगुने पानी में दो चम्मच नमक डालकर उस पानी में 10-15 मिनट दोनों पैरों को डालकर बैठें तत्पश्चात तलवों को किसी तौलिए से रगड़कर पोंछ लेना चाहिए। ऐसा करने से तलुवों का मैल निकल जायेगा। इसके बाद एड़ियों और तलवों पर सरसों का तेल मलकर सूती जुराबें पहन लेनी चाहिए। इस प्रकार से उपचार करने से फटी हुई एड़ियां कुछ ही दिनों में ठीक हो जाती हैं।
          • त्रिफला चूर्ण को खाने के तेल में तलकर मल्हम जैसा गाढ़ा कर लें. इसे सोते समय बिवाइयों में लगाने से थोड़े ही दिनों में बिवाइयाँ दूर हो जाती हैं.
          • रात्रि सोने से पहले ग्लिसरीन, गुलाबजल और जैतून के तेल को समभाग एकसाथ मिला लें। फिर इस तेल से तलुवों तथा एड़ियों की मालिश करें। ऐसा प्रतिदिन करने से यह रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है।
          • चावल को पीसकर नारियल में छेद करके भर दें और छेद बन्द करके रख दें। 10-15 दिन में चावल सड़ जाएगा, अब इस चावल को पीसकर काँच की शीशी में रख लें. रोज रात को इस पेस्ट को बिवाइयों में भरकर सो जाया करें.
          • हरी मुलायम घास और नीम के 10 से 12 पत्ते पीसकर पूरी पगतली में अच्छी तरह से लगाकर आधे घंटे बाद धो लें। इससे एड़िया जल्दी ही ठीक हो जाती है।
          • फटी हुई एड़ियों को साबुन, राख, मिट्टी तथा कीचड़ आदि से बचाकर रखना चाहिए।
          • सप्ताह में एक बार नींबू का रस मिले हुए पानी से अपने पैरों को धोना चाहिए।
          • बरगद का दूध फटी हुई एड़ियों पर लगाने से बहुत अधिक लाभ मिलता है
          • गुड़, गुग्गल, राल, सैंधा-नमक, शहद, सरसों, मुलहटी व घी सब 10-10 ग्राम लें. घी व शहद को छोड़कर सब द्रव्यों को कूटकर महीन चूर्ण कर लें. अब इसमें घी व शहद मिलाकर मल्हम बना लें. इस मल्हम को रोज रात को बिवाइयों पर लगाने से ये कुछ ही दिन में ठीक हो जाती हैं.
          • रात को सोते समय सीधे चित्त लेट जाएँ. हाथ की उँगली लगभग डेढ़ इंच सरसों के तेल में भिगोकर नाभि में लगाकर रगड़ते हुए तब तक मालिश करते रहें जब तक कि तेल नाभि में जज्ब न हो जाए, तेल सूख न जाए. सिर्फ एक सप्ताह के प्रयोग से बिवाइयाँ ठीक हो जाती हैं और एड़ियां साफ, चिकनी व मुलायम हो जाती हैं तथा एडियों पर कुछ भी लगाने की जरूरत नहीं पड़ती है.
          • फटी हुई एड़ियों पर पिसी हुई मेहंदी लगाने से एड़ियां जल्दी ठीक हो जाती हैं।
          • सरसों के तेल में मोम मिलाकर फटी हुई एड़ियों पर लगाने से एड़िया जल्दी ठीक हो जाती है।
          • फटी हुई एड़ियों पर प्रतिदिन घी लगाने से एड़ियां जल्दी ठीक हो जाती हैं।
          • पानी में शलगम के टुकड़ों को डालकर उबाल लें। इसके बाद इस पानी से फटी हुई एड़ियों को धोने से फटी हुई एड़ियां ठीक हो जाती हैं।

            Saturday, February 20, 2016

            मस्सों का घरेलू उपचार,Home Remedies for Warts in Hindi

            Home Remedies in Hindi to Remove Skin Warts,Skin Tags,plantar wart removal

            मस्से शरीर पर कहीं भी हों खूबसूरती को कम कर देते हैं, विशेषकर चेहरे पर होने वाले मस्से। मस्सा (wart) शरीर पर कहीं कहीं काले रंग का उभरा हुआ मांस का छोटा दाना जो चिकित्सा विज्ञान के अनुसार एक प्रकार का चर्मरोग माना जाता है। यह प्रायः सरसों अथवा मूँग के आकार से लेकर बेर तक के आकार का होता है। यह प्रायः हाथों और पैर पर होता है किन्तु शरीर के अन्य अंगों पर भी हो सकता है।त्वचा पर पेपीलोमा वायरस के कारण छोटे खुरदरे कठोर गोल पिण्ड बन जाते हैं जिसे मस्सा कहते हैं।

            मस्से विषाणु संक्रमण से पैदा होते हैं। प्रायः ‘मानव पेपिल्लोमैविरस’ नामक विषाणु की कोई प्रजाति इसका कारण होती है। लगभग दस प्रकार के मस्से होते हैं। मस्से संक्रमण (छुआछूत) से हो सकते हैं और शरीर में वहाँ प्रवेश करते हैं जहाँ त्वचा कटी-फटी हो। प्रायः ये कुछ माह में स्वयं समाप्त हो जाते हैं किन्तु कभी-कभी वर्षों तक बने रह सकते हैं या पुनः हो सकते हैं।शरीर पर अनचाहे मस्सों के उग जाने से मन से बार बार यही आवाज आती है कि इन मस्सों से छुटकारा कैसे पाया जा सकता है। ये मस्से आपकी सुदरता में धब्बा बन कर आपको परेशान कर रहे हैं तो इन आसान उपायों की सहायता से आप इनसे छुटकारा पा सकते हैं। 

             मस्सों का घरेलू उपचार,

              • रोज दो तीन बार प्याज का लेप मस्सों पर करने से ये मस्से जड़ से खत्म हो जाएंगे। प्याज को काट कर मस्से पर घिसना भी लाभप्रद है।
              • शरीर की त्वचा पर यदि छोटे-छोटे काले मस्से हो गए हों तो उन पर काजू के छिलकों का लेप लगाने से मस्से साफ हो जाते हैं।
              • चूना और घी एक समान मात्रा में लेकर दोनों को खूब फेंटकर सुरक्षित रखें। उसे दिन में 3-4 बार मस्सों पर लगाएं। उससे मस्से जड़ से हट जाएंगे और दूबारा नहीं होंगे।
              • सोडा कास्टिक 6 ग्राम को 250 ग्राम की बोतल में घोलकर सुरक्षित जगह पर रख दें। सावधानी से रूई की सहायता से मस्सों पर लगाएं। मस्सों को दूर करने के लिए यह रामबाण दवा है।
              • बी काम्पलेक्स, विटामिन ए, सी, ई युक्तआहार के सेवन से मस्सों को दूर किया जा सकता है।मस्सों से छुटकारा पाने के लिए पोटेशियम बहुत लाभदायक है। पोटेशियम बहुत सी साग-सब्जी और फलों में पाया जाता है। जैसे – सेब, केला, अंगूर, आलू, मशरूम, टमाटर, पालक इत्यादि।
              • खट्टी सेब का रस मस्सों पर लगाने से मस्सों के छोटे-छोटे टुकड़े होकर गिर जाएंगे।
              • मुहासे या मस्से हों तो फिटकरी और काली मिर्च आधा-आधा ग्राम पानी में पीसकर मुहा पर मलने से लाभ होता है।
              • बरगद के पेड़ के पत्तों का रस मस्सों के उपचार के लिए बहुत ही असरदार होता है। इस प्रयोग से त्वचा सौम्य हो जाती है और मस्से अपने आप गिर जाते हैं।
              • एक चम्मच कोथमीर के रस में एक चुटकी हल्दी डालकर सेवन करने से मस्सों से राहत मिलती है।
              • कच्चे आलू का एक स्लाइस नियमित रूप से दस मिनट तक मस्से पर लगाकर रखने से मस्सों से छुटकारा मिल जायेगा।
              • मस्सा खत्म करने के लिए एक अगरबत्ती जला लें और अगरबत्ती के जले हुए गुल को मस्से का स्पर्श कर तुरन्त हटा लें। ऐसा 8-10 बार करें, इस उपाय से मस्सा सूखकर झड़ जाएगा।
              • ताजा अंजीर लें। इसे कुचलकर -मसलकर इसकी कुछ मात्रा मस्से पर लगावें और ३० मिनिट तक लगा रहने दें फ़िर गरम पानी से धोलें। ३-४ हफ़्ते में मस्से समाप्त होंगे
              • केले के छिलके को अंदर की तरफ से मस्से पर रखकर उसे एक पट्टी से बांध लें। और ऐसा दिन में दो बार करें और लगातार करते रहें जब तक कि मस्से ख़तम नहीं हो जाते।
              • अरंडी का तेल नियमित रूप से मस्सों पर लगायें। इससे मस्से नरम पड़ जायेंगे, और धीरे धीरे गायब हो जायेंगे। अरंडी के तेल के बदले कपूर के तेल का भी प्रयोग कर सकते हैं।
              • कलौंजी के कुछ दाने सिरके में पीस कर मस्सों पर लगा कर सो जाए कुछ दिनों में मस्से कट जायेंगे।
              • लहसून के एक टुकड़े को पीस लें, लेकिन बहुत महीन नहीं, और इस पीसे हुए लहसून को मस्से पर रखकर पट्टी से बांध लें। इससे भी मस्सों के उपचार में सहायता मिलती है
              • एक बूँद ताजे मौसमी का रस मस्से पर लगा दें, और इसे भी पट्टी से बांध लें। ऐसा दिन में लगभग 3 या 4 बार करें। ऐसा करने से मस्से गायब हो जायेंगे।
              • बंगला, मलबारी, कपूरी, या नागरबेल के पत्ते के डंठल का रस मस्से पर लगाने से मस्से झड़ जाते हैं। अगर तब भी न झड़ें, तो पान में खाने का चूना मिलाकर घिसें।
              • अम्लाकी को मस्सों पर तब तक मलते रहें जब तक मस्से उस रस को सोख न लें। या अम्लाकी के रस को मस्से पर मल कर पट्टी से बांध लें।
              • कसीसादी तेल मस्सों पर रखकर पट्टी से बांध लें।
              • थूहर का दूध या कार्बोलिक एसिड सावधानीपूर्वक लगाने से मस्से निकल जाते हैं। -मस्सों पर अलो वेरा को दिन में तीन बार लगायें। ऐसा एक सप्ताह तक करते रहें, मस्से गायब हो जायेंगे।
              • बेकिंग सोडा और अरंडी तेल को बराबर मात्रा में मिलाकर इस्तेमाल करने से मस्से धीरे-धीरे खत्म हो जाते हैं।
              • हरे धनिए को पीसकर उसका पेस्ट बना लें और इसे रोजाना मस्सों पर लगाएं।
              • चेहरे को अच्छी तरह धोएं और कॉटन को सिरके में भिगोकर तिल-मस्सों पर लगाएं। दस मिनट बाद गर्म पानी से फेस धो लें। कुछ दिनों में मस्से गायब हो जाएंगे
              • रात को सोते वक्त और सुबह के समय मस्सों पर शहद लगाने के लाभकारी परिणाम मिले हैं।
              • ग्वार पाठा (एलोवेरा) से मस्से की चिकित्सा की जा सकती है। एलोवेरा के रस में रूई का फ़ाया (काटन बाल) एक मिनट के लिये भिगोएं फ़िर इसे मस्से पर रखें और चिपकने वाली पटी (एढीसिव टेप। से स्थिर कर दें। यह प्रक्रिया दिन में कई बार करना उचित है। ३-४ हफ़्ते में मस्से साफ़ हो जाएंगे।
              • ताजा अंजीर मसलकर इसकी कुछ मात्रा मस्से पर लगाएं। 30 मिनट तक लगा रहने दें। फिर गुनगुने पानी से धो लें। मस्से खत्म हो जाएंगे
              • गाँठ को घोलने में कचनार पेड़ की छाल बहुत अच्छा काम करती है. आयुर्वेद में कांचनार गुग्गुल इसी मक़सद के लिये दी जाती है जबकि ऐलोपैथी में ओप्रेशन के सिवाय कोई और चारा नहीं है. * आकड़े के दूध में मिट्टी भिगोकर लेप करने से तथा निर्गुण्डी के 20 से 50 मि.ली. काढ़े में 1 से 5 मि.ली अरण्डी का तेल डालकर पीने से लाभ होता है। * गेहूँ के आटे में पापड़खार तथा पानी डालकर पुल्टिस बनाकर लगाने से न पकने वाली गाँठ पककर फूट जाती है तथा दर्द कम हो जाता है
              • बेकिंग सोडा और अरंडी तेल को बराबर मात्रा में मिलाकर इस्तेमाल करने से मस्से धीरे-धीरे खत्म हो जाते हैं। * बरगद के पत्तों का रस मस्सों के उपचार के लिए बहुत ही असरदार होता है। इसके रस को त्वचा पर लगाने से त्वचा सौम्य हो जाती है और मस्से अपने आप गिर जाते हैं।

              सावधानियां

              • मस्से को कभी भी काटना व जलाना नहीं चाहिए, क्योंकि इससे रोग गम्भीर हो सकता है। 
              • अधिक उम्र में मस्से निकलने पर चिकित्सक से जांच कराना जरूरी है। स्किन को धूप से बचाएं और धूप में निकलने से पहले सनस्क्रीन लोशन लगाना न भूलें। 
              • यदि मस्से अपने आप नरम हो जाएं, उनके आकार में परिवर्तन हो जाए, उनमें खुजली हो या उससे स्नव होने लगे तो तुरन्त चिकित्सक से सलाह लेकर उपचार कराएं, क्योंकि यह मीलानोमा या कैंसर भी हो सकता है।

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