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Monday, February 20, 2017

हाथ और पैरों के तलवों में जलन,Home Remedies For Burning Feet In Hindi,

हाथ और पैरों के तलवों में जलन,Pairo-ke-Taluo-ki-Jalan-Dur-Karane-ke-Upay
अक्सर कई लोगो को हाथो और पैरो में जलन होती हैं, वैसे तो ये समस्या गर्मियों में अधिक होती हैं, मगर कई बार कुछ बीमारियो के कारण ये सर्दियों में भी होती हैं। आज हम आपको बताएँगे इसके कारण और इसके सरल उपचार।

पैरों में जलन के कारण ,Causes of Burning Legs 

  • तंत्रिका तंत्र में शिथिलता या कमजोरी 
  • मधुमेह
  • अधिक शराब का सेवन 
  • विषाक्त पदार्थों का सेवन 
  • विटामिन बी, कैल्शियम और फोलिक एसिड की कमी 
  • किडनी रोग
  • पैर सिंड्रोम
  • अधिक गर्म दवाओं का सेवन
  • रक्त प्रवाह का कम होना  

हाथ और पैरों के तलवों में जलन,Pairo-ke-Taluo-ki-Jalan-Dur-Karane-ke-Upay

  • करेला : करेले के पत्तों का रस निकालकर पैरों के तलुवों पर इसकी मालिश करने से पैरों की जलन दूर हो जाती है। करेले के पत्तों को पीसकर पैरों पर लेप करने से भी इस रोग में लाभ होता है।
  • सरसो का तेल और लहसुन : सरसो के तेल में 3-4 लहसुन की कलियाँ काट कर तब तक गरम करे जब तक लहसुन की कलियाँ काली ना पड़ जाये। फिर उस तेल से हथेली और पैरो के तलवो में मालिस करने से जलन में आराम मिल जायेगा। सरसो के तेल में अनामिका ऊँगली को डुबो कर अपनी नाभि पर लेटकर गोल गोल तब तक घुमाए जब तक नाभि सारा तेल ना सोख ले। यह दोनों सबसे उत्तम तरीके है जलन से निजात पाने के।
  • लौकी : लौकी को काटकर इसके गूदे को पैरों के तलुवों पर लगाने से पैरो की गर्मी, जलन आदि दूर हो जाती है।
  • सरसों : हाथ-पैरों या पैरों के तलुवों में जलन होने पर सरसों का तेल लगाने से लाभ होता है। 2 गिलास गर्म पानी में 1 चम्मच सरसों का तेल मिलाकर रोजाना दोनों पैर इस पानी के अंदर रखें। 5 मिनट के बाद पैरो को किसी खुरदरी चीज से रगड़कर ठण्डे पानी से धोने से पैर साफ रहते हैं और पैरों की गर्मी दूर होती है।
  • मेहंदी : गर्मी के मौसम में जिन लोगों के पैरों में लगातार जलन होती रहती है उनकें पैरों में मेंहदी लगाने से उनकी जलन दूर हो जाती है।
  • आम : आम की बौर (फल लगने से पहले निकलने वाले फूल) को रगड़ने से हाथों और पैरों की जलन समाप्त हो जाती है।
  • धनिया : सूखे धनिये और मिश्री को बराबर मात्रा में लेकर पीस लें। फिर इसको 2 चम्मच की मात्रा में रोजाना 4 बार ठंडे पानी से लेने से हाथ और पैरों की जलन दूर हो जाती है।
  • मक्खन : मक्खन और मिश्री को बराबर मात्रा में मिलाकर लगाने से हाथ और पैरों की जलन दूर हो जाती है। 
  • कतीरा (कतीरा एक प्रकार का गोंद होता है) : 2 चम्मच कतीरा को रात को सोने से पहले 1 गिलास पानी में भिगों दें। सुबह कतीरा के फूल जाने इसको शक्कर के साथ मिलाकर रोजाना खाने से हाथों और पैरों की जलन दूर हो जाती है। वैसे तो यह हर मौसम में काम आता है लेकिन गर्मियों में बहुत ही लाभदायक होता है।
  • विटामिन : शरीर में विटामिन बी-1 की कमी के कारण भी पैरो के तलुओ में जलन होती हैं इसलिए भोजन में विटामिन बी-1 का इस्तेमाल करे। इसके लिए मटर, हरी सब्जिया, आलू, दूध, अंकुरित गेंहू, काजू इसके अच्छे स्त्रोत हैं।
  • ब्लड शुगर : अपनी ब्लड शुगर की भी जांच ज़रूर करवाये, कुछ रोगियों को ब्लड शुगर के कारण ऐसी समस्याओ का सामना करना पड़ता हैं।

Thursday, February 16, 2017

गाँठ का उपचार,Lump Treatment in Hindi,Lump Treatment in Ayurveda

अक्सर हमारे शरीर के किसी भी भाग में गांठे बन जाती हैं. जिन्हें सामान्य भाषा में गठान या रसौली कहा जाता हैं. किसी भी गांठ की शुरुआत एक बेहद ही छोटे से दाने से होती हैं. लेकिन जैसे ही ये बड़ी होती जाती हैं. इन गाठों की वजह से ही गंभीर बीमारियां भी हो जाती हैं. 
  • ये गांठे टी.वी से लेकर कैंसर की बीमारी की शुरुआत के चिन्ह होती हैं. अगर किसी व्यक्ति के शरीर के किसी भाग में कोई गाँठ हो गई हैं. जिसक कारण उस गाँठ से आंतरिक या बाह्य रक्तस्राव हो रहा हो. तो हो सकता हैं कि यह कैंसर की बीमारी के शुरुआती लक्षण हो. 
  • लेकिन इससे यह भी सुनिश्चित नहीं हो जाता कि ये कैंसर के रोग को उत्पन्न करने वाली गांठ हैं. कुछ गाँठ साधारण बिमारी उत्पन्न होने के कारण भी हो जाती हैं. 
  • किन्तु हमें किसी भी प्रकार की गांठों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए तथा उसका तुरंत ही उपचार करवाना चाहिए. 
  • कुछ स्त्रियाँ या पुरुष नासूर या ऑपरेशन कराने के डर से जल्द गाँठ का इलाज नहीं करवाते. लेकिन ऐसे व्यक्तियों के लिए यह समझना बहुत ही आवश्यक हैं कि इन छोटी सी गांठों को यदि आप लगातार नजरअंदाज करेंगें. 
  • तो इन गांठों की ही वजह से ही आपको बाद में अधिक परेशानी का सामना करना पड सकता हैं. आज हम आपको शरीर के किसी भी भाग में होने वाली गांठ को ठीक करने के लिए कुछ आयुर्वेदिक उपचारों के बारे में बतायेंगें.

गाँठ का उपचार,Lump Treatment in Hindi,Lump Treatment in Ayurveda,

  • कचनार की छाल और गोरखमुंडी (Bauhinia Bark And Gorkmundi) किसी भी तरह की गाँठ को ठीक करने के लिए 25 से 30 ग्राम तक कचनार की ताज़ी और सुखी छाल लें और इसे मोटा – मोटा कूट लें. अब एक गिलास पानी लें और इस पानी में कचनार की कुटी हुई छाल डालकर 2 मिनट तक उबाल लें.जब यह अच्छी तरह से उबल जाएँ. तो इसमें एक चम्मच पीसी हुई गोरखमुंडी डाल दें. अब इस पानी को एक मिनट तक उबालें. 
  • इसके बाद आप इस पानी को छानने के बाद इसका दिन में दो बार सेवन कर सकते हैं. इस पानी का सेवन करने के बाद आपको गलें, जांघ, हाथ, प्रोटेस्ट, काँख, गर्भाशय, टॉन्सिल, स्तन तथा थायराइड के कारण निकली हुई गाँठ से लगातार 20 – 25 दिनों तक सेवन करने से छुटकारा मिल जाएगा. 
  • आकडे का दूध (Figures Milk) – गाँठ को ठीक करने के लिए आप आकडे के दूध में मिटटी मिला लें. अब इस दूध का लेप जिस स्थान पर गाँठ हुई हैं. वहाँ पर लगायें आपको आराम मिलेगा. 
  • निर्गुण्डी (Nirgundi) – किसी भी प्रकार की गाँठ से मुक्त होने के लिए 20 से 25 मिली काढ़ा लें और उसमें 1 से 5 मिली लीटर तक अरंडी का तेल मिला लें. इन दोनों को अच्छी तरह से मिलाने के बाद इस मिश्रण का सेवन करें. तो आपकी गांठ ठीक हो जायेगी. 
  • गेहूं का आटा (Wheat Flour) – गेहूं का आटा लें और उसमें पानी डाल लें. अब इस आटे में पापड़खार मिला लें और इसका सेवन करें. आपको लाभ होगा. 
  • गण्डमाला की गाँठें (Goitre) गले में दूषित हुआ वात, कफ और मेद गले के पीछे की नसों में रहकर क्रम से धीरे-धीरे अपने-अपने लक्षणों से युक्त ऐसी गाँठें उत्पन्न करते हैं जिन्हें गण्डमाला कहा जाता है। मेद और कफ से बगल, कन्धे, गर्दन, गले एवं जाँघों के मूल में छोटे-छोटे बेर जैसी अथवा बड़े बेर जैसी बहुत-सी गाँठें जो बहुत दिनों में धीरे-धीरे पकती हैं उन गाँठों की हारमाला को गंडमाला कहते हैं और ऐसी गाँठें कंठ पर होने से कंठमाला कही जाती है। 
  • क्रौंच के बीज को घिस कर दो तीन बार लेप करने तथा गोरखमुण्डी के पत्तों का आठ-आठ तोला रस रोज पीने से गण्डमाला (कंठमाला) में लाभ होता है। तथा कफवर्धक पदार्थ न खायें।

Monday, February 13, 2017

मांसपेशियों में खिंचाव,Home Remedies for Pulled Muscle in Hindi,


Treatment Of Pulled Muscle‎ in Hindi,

मांसपेशियों का दर्द या ऐंठन आमतौर पर पाई जाने वाली समस्याओं में से एक है। और यह एक से अधिक मांसपेशियों में हो सकता है। मांसपेशियों के दर्द में, ऊतक के लिगामेंट, टेंडोंस, फेशिया, और मांसपेशियों के संपर्क में आनेवाले कोमल ऊतकों और हड्डियों में दर्द हो सकता है।

कभी काम करते-करते, दिनचर्या में भाग दौड़, कभी खेलते या दौड़ते में और कभी यूं ही सामान्य अवस्था में अचानक मांसपेशियों में खिंचाव आ जाता है। इस खिंचाव को हल्के में न लें यह एक बड़ी समस्या भी बन सकती है अधिक व्यायाम करने से भी मांसपेशियों में दर्द हो जाता है। इस स्थिति में हमारे शरीर को अधिक ऑक्सीजन की आवश्यकता होती है। इस अधिक ऑक्सीजन की आवश्यकता की पूर्ति करने के लिए मांसपेशियों में अवायुश्वसन होता है जिसके कारण लेक्टिक एसिड एकत्रित होने लगता है। इस लेक्टिक एसिड के कारण मांसपेशियों में थकान और दर्द होता है।

मांसपेशियों में खिंचाव आने के कारण 

  • अनियमित जीवन शैली और गलत खान-पान इस बीमारी का सबसे बड़ा कारण है. शरीर को पर्याप्त मात्रा में कैल्शियम नहीं मिलने से हड्डियां कमजोर हो जाती हैं. अधिक वजन होने से भी कमर, घुटने में दर्द जैसी समस्या होती है. 
  • पेट बढ़ने से रीढ़ पर तनाव बढ़ता है, जिससे कमर दर्द शुरू हो जाता है. अचानक झुकने, वजन उठाने, झटका लगने, गलत तरीके से उठने-बैठने और सोने, व्यायाम न करने से भी कमर दर्द या मांसपेशियों का दर्द हो सकता है. 
  • ऊबड़-खाबड़ रास्तों में तेज ड्राइविंग से भी रीढ़ की डिस्क प्रभावित हो सकती है. कठोर श्रम या चोट हो सकता है कारण मांसपेशियों में दर्द पूरे शरीर की स्थिति का संकेत हो सकता है. 
  • शारीरिक परिश्रम या कठोर श्रम के कारण तनाव, थकान या मांसपेशियों में चोट, इन्फ्लूएंजा, लाइम डिजीज, मलेरिया, डेंगू, मांसपेशी का फोड़ा तथा संक्रमण की वजह से भी दर्द हो सकता है. इलेक्ट्रोलाइट का असंतुलन जैसे-पोटैशियम या कैल्शियम की मात्रा बहुत कम होना भी इसका कारण हो सकता है.

मांसपेशियों में खिंचाव आने के लक्षण:

जब मसल्स का खिचांव होता है तो तेज दर्द के साथ कुछ अन्य लक्षण भी है जोे आज हम आपको बता रहे है।
  • यदि किसी खुली चोट की वजह से मसल्स फटी या टूटी हैं तो खुला घाव नजर आना।
  • जहा दर्द हो रहा हो उस जगह पर सूजन।
  • चलने-फिरने में भी कठिनाई आना और दर्द होना।
  • बेचैन करने वाला दर्द और आराम करने पर भी दर्द का बने रहना।
  • प्रभावित स्थान पर त्वचा के रंग का बदल जाना व अकड़न महसूस होना।
  • कमजोरी महसूस होना।

मांसपेशियों में खिंचाव आने पर प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार

  • मांसपेशियों में खिंचाव आने पर रोगी व्यक्ति को पूरी तरह से आराम करना चाहिए।
  • रोगी को अपनी मांसपेशियों पर हर 2 घण्टे के अन्तराल पर आधे घण्टे के लिए बर्फ से मालिश करनी चाहिए।
  • मांसपेशियों में खिंचाव से पीड़ित रोगी को गर्म तथा ठंडा स्नान करना चाहिए।
  • मांसपेशियों में खिंचाव से पीड़ित रोगी को विटामिन `सी´ की मात्रा वाली चीजों का भोजन में अधिक सेवन करना चाहिए।
  • जडी बूटियाँ और लेप कुछ जडी बूटियों में एंटी इम्फ्लेमेट्री (प्रदाहनाशी) और आरामदायक गुण होते हैं। जबकि हर्बल लेप (जडी बूटियों के अर्क का अर्द्ध ठोस रूप जो लोशन, जेल या बामके रूप में होता है) त्वचा तथा ऊतकों में अंदर तक प्रवेश करते हैं तथा आराम पहुंचाते हैं।
  • मांसपेशियों में खिंचाव आने पर तेल से शरीर की मालिश करनी चाहिए जिसके फलस्वरूप दर्द जल्दी ही ठीक हो जाता है।
  • प्रभावित स्थान पर बर्फ लगाने से सूजन, ब्लीडिंग और दर्द में आराम मिलता है। मांसपेशियों में खिंचाव आने के बाद जितनी जल्दी आप बर्फ लगा सकते हैं, लगा लें। आप कितनी भी बार बर्फ लगा सकते हैं। बस ये ध्यान में रखें कि जब भी बर्फ लगाएं, 15 मिनट से ज्यादा देर के लिए न लगाएं।
  • तेल से मालिश मालिश से मांसपेशियों में रक्त परिसंचरण बढ़ता है जिससे मांसपेशियों को गर्मी मिलती है तथा यह लेक्टिक एसिड को दूर करता है जबकि तेल मांसपेशियों को आराम पहुंचाता है और दर्द से राहत दिलाता है। विभिन्न प्रकार के तेल जैसे पाइन, लैवेंडर, अदरक और पिपरमेंट का तेल मांस पेशियों के दर्द को कम करने में सहायक होते हैं।
  • एप्सम सॉल्ट (Epsom salt) गर्म पानी की एक बाल्टी में या टब में एक कप एप्सम नमक डाल कर प्रभावित स्थान को इस पानी में तकरीबन 15 मिनट के लिए डुबा कर रखें। एक हफ्ते में इस प्रक्रिया को दो से तीन बार कर सकते हैं। लेकिन हृदय से संबंधित, शुगर या उच्च रक्तचाप (high blood pressure) की समस्या से पीड़ित व्यक्ति इस विधि को न करें।
  • गर्म और ठंडा सेक (Hot and cold fomentation) गर्म पानी से नहाने से मांसपेशियों की सिकाई होती है और उन्हें आराम भी मिलता है। इस तरह से मांसपेशियों की अकड़न भी दूर होती है। लेकिन इसके उलट यदि सूजन महसूस हो रही हो तो बर्फ के टुकड़ों को पतले कपड़े में लपेटकर उससे सिकाई करनी चाहिए।
  • मैग्नीशियम युक्त खाना (Magnesium rich food) मैग्नीशियम की कम मात्रा से भी मांसपेशियों में दर्द और खिंचाव हो सकता है। इसके लिए खाने में कद्दू के बीज (pumpkin seeds), काली बीन्स (black beans), सूरजमुखी के बीज (sunflower seeds), बादाम और काजू को अपने आहार में शामिल करना चाहिए। जिससे शरीर को प्रचुर मात्रा में मैग्नीशियम मिल सके।
  • सेब का सिरका (Apple cider vinegar) सेब के सिरके की कुछ मात्रा एक गिलास पानी में मिलाकर पीने से मसल्स के दर्द से राहत मिलती है। इसके अलावा यदि इस तरह पीना कठिन लगे तो एक गिलास पानी में दो चम्मच सिरका, एक चम्मच शहद और कुछ पत्तियां पुदीने की मिलाकर भी पी जा सकती हैं।
  • ऑयल (Oil) मसल पेन में राहत के लिए कैमोमाइल, पेपरमिंट, लेवेंडर आदि तेल में एक या दो चम्मच, नारियल या ऑलिव ऑयल मिलाकर प्रभावित स्थान पर लगाना चाहिए।
  • चेरी जूस (Cherry juice) मसल पेन से राहत के लिए चेरी जूस भी पीना चाहिए। चेरी जूस पीने से मसल्स का खिंचाव कम होता है साथ ही यह मांसपेशियों को राहत भी देता है।
  • मसाज (Massage) मसाज करने से शरीर का रक्तसंचार बेहतर होता है जो कि दर्द को तेजी से ठीक करने में मदद करता है। यदि मसाज करने के लिए अच्छे तेलों का प्रयोग किया जाए तो असर दोगुना हो जाता है।
  • मिर्च में मौजूद कैप्सेसिन (capsaicin) भी दर्द की खास दवा है। बाजार में मिर्च से तैयार कई तरह की दर्द निवारक क्रीम मिलती हैं, लेकिन इन्हें आप घर भी तैयार कर सकते हैं। इसके लिए नारियल या जैतून के तेल को गरम करके इसमें एक बड़ा चम्मच लाल मिर्च मिलाकर इसे ठंडा करें। इसके बाद इसमें एलोवेरा जेल मिलाएं। इस तरह से तैयार उत्पाद को यदि प्रभावित स्थान पर लगाकर हल्के हाथ से मालिश की जाए तो बेहद आराम मिलता है।
  • आराम (Rest) कई बार कुछ न करके सिर्फ आराम करना भी शरीर को बहुत लाभ दे सकता है। यदि शरीर में अकड़न महसूस हो तो कम से कम दो दिन आपको शरीर को पूरी तरह आराम देना चाहिए। इससे शरीर हल्का महसूस करता है और तनाव कम होता है जिसका सीधा असर मांसपेशियों पर भी पड़ता है।

गला बैठना और उसका इलाज,Home Remedies for Hoarseness In Hindi,

इस रोग में रोगी का गला बैठ जाता है जिसके कारण रोगी को बोलने में परेशानी होने लगती है तथा जब व्यक्ति बोलता है तो उसकी आवाज साफ नहीं निकलती है तथा उसकी आवाज बैठी-बैठी सी लगती है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि स्वर नली के स्नायुओं पर किसी प्रकार के अनावश्यक दबाव पड़ने के कारण वे निर्बल पड़ जाती हैं। इस रोग के कारण रोगी की आवाज भारी होने लगती है तथा गले में खुश्की हो जाती है और कभी-कभी रोगी को सूखी खांसी और सांस लेने में परेशानी होने लगती है।

गला बैठने के कारण :- Causes

  • अधिक गाना गाने, चीखने-चिल्लाने तथा जोर-जोर से भाषण देने से रोगी का गला बैठ जाता है।
  • ठंड लगने तथा सीलनयुक्त स्थान पर रहने के कारण गला बैठ सकता है।
  • ठंडी चीजों का भोजन में अधिक प्रयोग करने के कारण भी यह रोग सकता है।
  • शरीर के अन्दर किसी तरह का दूषित द्रव्य जमा हो जाने पर जब यह दूषित द्रव्य किसी तरह से हलक तक पहुंच जाता है तो गला बैठ जाता है।

गला बैठने का प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार ,गला बैठने पर क्या करें,

  • गला बैठने के रोग का उपचार करने के लिए सबसे पहले रोगी व्यक्ति को अपने पेड़ू पर गीली मिट्टी की पट्टी से लेप करना चाहिए तथा इसके बाद एनिमा क्रिया का प्रयोग करके पेट को साफ करना चाहिए। 
  • गला बैठने के रोग से पीड़ित रोगी को सुबह तथा शाम के समय में अपने गले के चारों तरफ गीले कपड़े या मिट्टी की गीली पट्टी का लेप करना चाहिए। 
  • काली मिर्च - यदि सर्दी जुखाम के कारण आपका गला बैठ गया है तो रोजाना सोने से पहले तीन से चार काली मिर्च और उतनी ही मात्र में मिश्री को एक साथ चबाने से बैठ गला खुल जाता है |
  • हल्दी - यदि tonsil के कारण आपका गला बैठ गया है तो एक गिलास गर्म दूध में एक चमच हल्दी पाउडर मिलाकर सोने से पहले पीने से tonsil एक से दो दिन में ठीक हो जाता है जिस कारण बैठा हुआ गला भी खुल जाता है |
  • रोगी व्यक्ति को अपने गले, छाती तथा कंधे पर बारी-बारी से गर्म या ठंडा सेंक करना चाहिए तथा इसके दूसरे दिन उष्णपाद स्नान (गर्म पानी से पैरों को धोना) करना चाहिए। 
  • रोगी व्यक्ति को गर्म पानी में हल्का सा नमक मिलाकर उस पानी से गरारे करने चाहिए और सुबह तथा शाम के समय में एक-एक गिलास नमक मिला हुआ गर्म पानी पीना चाहिए। 
  • गला बैठना रोग से पीड़ित रोगी को 1 सप्ताह तक चोकरयुक्त रोटी तथा उबली-सब्जी खानी चाहिए। 
  • इस रोग से पीड़ित रोगी को फल और दूध का अधिक सेवन करना चाहिए जिसके फलस्वरूप यह रोग ठीक हो जाता है। 
  • रोगी व्यक्ति को पानी में नींबू का रस मिलाकर दिन में कई बार पीना चाहिए तथा इसके अलावा गहरी नीली बोतल का सूर्यतप्त जल कम से कम 25 मिलीलीटर की मात्रा में दिन में 6 बार पीना चाहिए। इस प्रकार से प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार करने से यह रोग ठीक हो जाता है।
  • गले के रोगों को ठीक करने के लिए सबसे पहले रोगी व्यक्ति को 1-2 दिन फलों के रस को पीकर उपवास रखना चाहिए।
  • अनन्नास, सेब, अंजीर, शहतूत, मेथी, लहसुन तथा पपीता का सेवन अधिक करने से गले के कई प्रकार के रोग ठीक हो जाते हैं।
  • अंगूर का रस पीने से गला बैठने का रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है।
  • यदि गले में खराश हो तो तुलसी और अदरक का रस शहद में मिलाकर चाटने से लाभ होता है।
  • यदि गला बैठा हो या सूज रहा हो तो पानी में नींबू निचोड़कर गरारा करने से बहुत अधिक लाभ मिलता है।
  • फिटकिरी - यदि किसी कारण वश आपके गले में सुजन आ गई हो और उस कारण आपका गला बैठ गया हो तो एक गिलास पानी ले और उसमे 50 ग्राम फिटकिरी को डाल कर दिन में दो से तीन बार गारगल करे | ऐसा करने से गले की खराश दूर हो जाती है और आपके गले को आराम मिलती है | इस प्रक्रिया को दो से तीन दिन करने से आपकी गले की सुजन कम हो जाता है और बैठा हुआ गला ठीक हो जाएगा |
  • चुना - गला बैठने पर सोने से पहले चुने का लेप बना ले और इसे सोने से पहले गले पर लगाए जिससे सुबह तक बैठा गला ठीक हो जाता है
  • मेथी के दानों को पानी में उबाल कर उस पानी से गरारा करने से मुंह के छाले जल्दी ठीक हो जाते हैं।
  • गले के रोगों को ठीक करने के लिए मिट्टी की गर्म पट्टी गले के चारों तरफ लगाकर उपवास रखने तथा एनिमा लेने से बहुत अधिक लाभ मिलता है।
  • यदि भोजन को निगलते समय दर्द हो रहा हो तो सूर्यतप्त नीली बोतल के पानी से गरारा करने से भी रोगी को लाभ होता है।
  • गले के रोग को ठीक करने के लिए गले पर गर्म या ठंडा सेंक करना चाहिए। इसके फलस्वरूप रोगी को बहुत अधिक फायदा मिलता है।
  • गले में दर्द होने पर तुलसी का रस शहद में मिलाकर चाटने से गले में दर्द होना बंद हो जाता है।
  • अंजीर को पानी में उबालकर उस पानी से गरारा करने से गला बैठने का रोग ठीक हो जाता है।
  • त्रिफला का चूर्ण फांककर दूध में मिलाकर पीने से गले के कई रोग ठीक हो जाते हैं।
  • यदि गले में कोई रोग हो जाए तो अंगूठे और तर्जनी उंगली के भाग पर मालिश करने से गले का रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है।
  • एक गिलास पानी में आधा चम्मच चाय की पत्ती उबालकर उस पानी से गरारा करने से रोगी व्यक्ति को बहुत अधिक लाभ मिलता है। इस क्रिया को दिन में 3-4 बार करने से यह रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है। इस प्रकार से उपचार करने से गले में दर्द तथा सूजन भी ठीक हो जाती है।
  • एक चम्मच लहसुन के रस को एक गिलास पानी में डालकर उस पानी को उबाल लें। इस पानी से दिन में 3-4 बार गरारा करने से गले के रोगों में बहुत अधिक लाभ मिलता है।
  • गले के रोगों को ठीक करने के लिए कई प्रकार के आसन भी हैं जिन्हें करने से गले के रोग ठीक हो जाते हैं ये आसन इस प्रकार हैं- सूर्य नमस्कार तथा सिंहासन। 

Saturday, February 11, 2017

हाथ और पैर में झुनझुनी,Home Remedies for Numb Hands and Feet In Hindi,

हाथ और पैर में झुनझुनी,Home Remedies for Numb Hands and Feet In Hindi,
शरीर का कोई अंग यदि किसी दबाव में ज्यादा समय तक रहता है,तो वह सुन्न हो जाता है.वस्तुतः यह दबाव हाथ या पैर की नसों पर पड़ता है, ये नसें कई एक कोशीय फाइबर से बनी होती है. प्रत्येक एक कोशीय फाइबर अलग-अलग संवेदनाओं को मस्तिष्क तक पहुँचाने का कार्य करता है.इन फाइबरों की मोटाई भी कम-ज्यादा होती है.इसका कारण माइलिन नामक श्वेत रंग के पदार्थ द्वारा बनाई गई झिल्ली है.इन पर दबाव पड़ने से मस्तिस्क तक नसों द्वारा पर्याप्त मात्रा में आक्सीजन और रक्त का संचरण नहीं हो पता है. मस्तिष्क तक उस अंग के बारे में पहुंचने वाली जानकारी रक्त और आक्सीजन के अभाव में अवरूद्ध हो जाती है.इस कारण वहां संवेदना महसूस नहीं हो पाती और वह अंग सुन्न हो जाता है.

जब उस अंग पर से दबाव हट जाता है तब रक्त और आक्सीजन का संचरण नियमित हो जाता है और पुनः उस अंग में संवेदनशीलता लौट आती है.

हाथ और पैर में झुनझुनी के लक्षण 

इस रोग में रक्त धमनियों की भीतरी दीवारों पर वसा जम जाती है। ये हाथ-पांवों के ऊतकों में रक्त प्रवाह को रोकता है। इस रोग के प्राथमिक चरण में चलने या सीढ़ियां चढ़ने पर पैरों और कूल्हों थकाना या दर्द महसूस होता है। अन्य लक्षण होते हैं दर्द, सुन्न होना, पैर की पेशियों में भारीपन। शारीरिक काम करते समय मांसपेशियों को अधिक रक्त प्रवाह चाहिए होता है। 

मधुमेह या डायबिटीज मेलीटस :यदि आपको मधुमेह है तो रक्त में शर्करा की मात्रा को नियंत्रण में रखें,क्या है 
यह बीमारी उन लोगों में ज्यादा होती है, जो हाइपरटेंशन, डायबिटीज, उच्च रक्तचाप, हाईकॉलेस्ट्रॉल के मरीज होते हैं या उनके खून में फैट या लिपिड की मात्रा ज्यादा होती है। साथ ही धूम्रपान ज्यादा करने वालों को भी ये समस्या होती है। इसके अलावा, खून का थक्का जमने के कारण रक्त-शिराएं ब्लॉक हो जाती हैं। 

हाथ और पैर में झुनझुनी का घरेलू उपचार ,

गर्म पानी का सेंक

गर्म पानी का सेंक-सबसे पहले प्रभावित जगह पर गर्म पानी की बोतल से सेंक रखें। इससे वहां की ब्लड सप्लाई बढ़ जाएगी। इससे मासपेशियां और नसें रिलेक्स होंगी। एक साफ कपड़े को गर्म पानी में 5 मिनट के लिए भिगोएं और फिर उससे प्रभावित जगह को सेंकें। आप चाहें तो गर्म पानी से स्नान भी कर सकती हैं।

गर्म तेल से करें मसाज

हाथ पैरों के सुन्न पड़ने पर आप जैतून या फिर सरसों के तेल को हल्का गर्म करके उससे हाथ पैरों की मालिश करें. ऐसा करने से सुन्न पड़े अंगों की नसें खुलती हैं और प्रभावित हिस्से में ब्लड सर्कुलेशन बढ़ता है.  प्रभावित अंगों के मसाज से आप अपनी इस परेशानी से काफी हद तक राहत पा सकते हैं.

प्रभावित जगह पर मसाज करे।

हाथ या पैर में सुन्‍नपन आने पर मसाज इस समस्‍या से निपटने का सबसे आसान और सरल तरीका है। यह ब्‍लड सर्कुलेशन को बढ़ाता है, जिससे सुन्नता में कमी आती है। इसके अलावा यह मसल्‍स और नसों को प्रोत्‍साहित कर, समग्र कामकाज में सुधार करता है। अपने हाथों में गर्म जैतून, नारियल या सरसों के तेल लेकर इसे सुन्न हिस्‍से में लगाकर 5 मिनट के लिए सर्कुलर मोशन में अपनी उंगालियों से मसाज करें। जरूरत पड़ने पर इस उपाय को दोहराये।

एक्सरसाइज करें-

व्यायाम करने से शरीर में ब्लड र्स्कुलेशन होता है और वहां पर आक्सीजन की मात्रा बढ़ती है। रोजाना हाथ और पैरों का 15 मिनट व्यायाम करना चाहिए। इसके अलावा हफ्ते में 5 दिन के लिए 30 मिनट एरोबिक्स करें, जिससे आप हमेशा स्वस्थ बने रहें।एक्सरसाइज शरीर के विभिन्न अंगों में ब्लड सर्कुलेशन और ऑक्सीजन में सुधार करता है, जिससे हाथ और पैर सहित शरीर के किसी भी अंग में सुन्नपन, झनझनाहट को रोकने में मदद मिलती है। इसके अलावा नियमित रूप एक्सरसाइज गतिशीलता में सुधार और कई स्वास्थ्य समस्याओं से बचाता है।

मैग्नी शियम का सेवन जरूर करें

हरी पत्तेीदार सब्जिेयां, मेवे, बीज, ओटमील, पीनट बटर, ठंडे पानी की मछलियां, सोया बीन, अवाकाडो, केला, डार्क चॉकलेट और लो फैट दही आदि जरूर खाएं। आप रोजाना मैग्नीlशियम 350 एम जी की सपलीमेंट भी ले सकते हैं।

हल्दी का उपयोग 

हल्दी-हल्दी में मौजूद कुरकुर्मीन नाम का तत्व पूरे शरीर में ब्लड सर्कुलेशन में सुधार करने में मदद करता है। इसके अलावा, इसमें मौजूद एंटी-इंफ्लेमेंटरी गुण प्रभावित हिस्से में दर्द और परेशानी कम करने में मदद करता है। समस्या होने पर एक गिलास दूध में आधा चम्मच हल्दी मिक्स करके हल्की आंच पर पकाएं। फिर इसमें थोड़ा सा शहद मिलाकर दिन में एक बार पीने से ब्लड सर्कुलेशन में सुधार होता है। आप हल्दी और पानी से बने पेस्ट से प्रभावित हिस्से पर मसाज भी कर सकते हैं।

खूब खाएं Vitamin B फूड

अगर हाथ-पैरों में जन्न-जन्नाशहट सी होती है तो अपने आहार में ढेर सारे विटामिन बी, बी6 और बी12 को शामिल करें। इनके कमी से भी हाथ, पैरों, बाजुओं और उंगलियों में सुन्न पैदा हो जाती है। आपको अपने आहार में अंडे, अवाकाडो, मीट, केला, बींस, मछली, ओटमील, दूध, चीज़, दही, मेवे, बीज और फल शामिल करने चाहिये।

दालचीनी का उपयोग

दालचीनी का उपयोग करें-दालचीनी में केमिकल और न्यूट्रिएंट्स होते हैं जो हाथ और पैरों में ब्लड फ्लो को बढ़ाते हैं। एक्सपर्ट बताते हैं रोजाना 2-4 ग्राम दालचीनी पाउडर को लेने से ब्लड सर्कुलेशन बढ़ता है। इसको लेने का अच्छा तरीका है कि एक गिलास गर्म पानी में 1 चम्मच दालचीनी पाउडर मिलाएं और दिन में एक बार पिएं। दूसरा तरीका है कि 1 चम्मच दालचीनी और शहद मिला कर सुबह कुछ दिनों तक सेवन करें।

औषिधि के रूप में सिर्फ "" नवायस लौह वटी "" २ -२ गोली दूध के साथ सुबह शाम सेवन करे

Thursday, December 22, 2016

फाइलेरिया के कारण लक्षण और उसके घरेलू उपाय,What is Filaria in Hindi,

फाईलेरिया रोग का इलाज संभव है। अगर इसका इलाज प्रारंम्भिक अवस्था में हो जाय तो संक्रमण को फैलने से रोका जा सकता है। फाइलेरिया रोग में अकसर हाथ या पैर बहुत ही ज़्यादा सूज जाते हैं। इसलिए इस रोग को हाथी पांव भी कहते हैं। पर फाइलेरिया रोग से पीड़ित हर व्यक्ति के हाथ या पैर नहीं सूजते। यह बीमारी पूर्वी भारत, मालाबार और महाराष्ट्र के पूर्वी इलाकों में बहुत अधिक फैली हुई है।
  • यह कृमिवाली बीमारी है। यह कृमि लसिका तंत्र की नलियों में होते हैं और उन्हें बंद कर देते हैं। क्यूलैक्स मच्छर के काटने से बहुत छोटे आकार के कृमि शरीर में प्रवेश करते हैं। मलेरिया के कीड़ों की तरह यह कीड़े मनुष्यों और मच्छरों दोनों में छूत पैदा करते हैं फाइलेरिया (Lymphatic Filariasis) एक परजीवीजन्य संक्रामक बीमारी है जो धागे जैसे कृमियों से होती है। वैश्विक स्तर पर इसे एक उपेक्षित उष्णकटिबंधीय बीमारी (Neglected Tropical Disease) माना जाता है। 
  • फाइलेरिया दुनिया भर के उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय देशों में एक गंभीर स्वास्थ्य समस्या है। जिसमें भारत भी शामिल है। विश्व में लगभग 1.3 अरब लोगों को इस बीमारी के संक्रमण का खतरा है और लगभग 12 करोड़ लोग इससे वर्तमान में संक्रमित हो चुके हैं, जिनमें से लगभग 4 करोड़ लोग इस बीमारी की वजह से किसी विकृति का शिकार हो गए हैं या अक्षम हो चुके हैं।
  • फाइलेरिया 2.5 करोड़ से ज्यादा पुरुषों को जननांग के विकार और 1.5 करोड़ से ज्यादा लोगों को सूजन से प्रभावित कर चुका है। हाथीपांव (Elephantiasis) फाइलेरिया का सबसे सामान्य लक्षण है जिसमें शोफ (Oedema) के साथ चमड़ी तथा उसके नीचे के ऊतक मोटे हो जाते हैं।

क्या हैं फाइलेरिया के लक्षण,filaria symptoms

इस तथ्य का अभी तक सटीक आकलन नहीं किया जा सका है कि संक्रमण के बाद फाइलेरिया के लक्षण प्रकट होने में कितना समय लगता है। हालांकि मच्छर के काटने के 16-18 महीनों के पश्चात बीमारी के लक्षण प्रकट होते हैं। फाइलेरिया के ज्यादातार लक्षण और संकेत वयस्क कृमि के लसीका तंत्र में प्रवेश के कारण पैदा होते हैं
  • कृमि द्वारा ऊतकों को नुकसान पहुंचाने से लसीका द्रव का बहाव बाधित होता है जिससे सूजन, घाव और संक्रमण पैदा होते हैं। पैर और पेड़ू सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाले अंग हैं। फाइलेरिया का संक्रमण सामान्य शारीरिक कमजोरी, सिरदर्द, मिचली, हल्के बुखार और बार-बार खुजली के रूप में प्रकट होता है।
  • फाइलेरिया कभी-कभार ही जानलेवा साबित होता है, हालांकि इससे बार-बार संक्रमण, बुखार, लसीका तंत्र में गंभीर सूजन और फेफड़ों की बीमारी ‘ट्रॉपिकल पल्मोनरी इओसिनोफीलिया (Tropical Pulmonary Eosinophilia) हो जाती है। ट्रॉपिकल पल्मोनरी इओसिनोफीलिया के लक्षणों में खांसी, सांस लेने में परेशानी और सांस लेने में घरघराहट की आवाज होती है। लगभग 5 प्रतिशत मामलों में पैरों में सूजन आ जाती है जिसे फ़ीलपांव अथवा हाथीपांव कहते हैं। फाइलेरिया से गंभीर विकृति, चलने-फिरने में परेशानी और लंबी अवधि की विकलांगता हो सकती है।
  • फाइलेरिया के कारण हाइड्रोसील (Hydrocoele) भी हो सकता है। मरीज के वृषणकोष (Scrotum) में सूजन भी आ सकती है जिसे ‘फाइलेरियल स्क्रोटम’ (Filarial scrotum) कहा जाता है। कुछ मरीजों में मूत्र का रंग दूधिया हो जाता है। महिलाओं में वक्ष या बाह्य जननांग भी प्रभावित होते हैं। कुछ मामलों में पेरिकार्डियल स्पेस (हृदय और उसके झिल्लीदार आवरण के बीच की जगह) में भी द्रव जमा हो जाता है।

फाइलेरिया के कौन से कारक जीव

फाइलेरिया, फाइलेरियोडिडिया (Filariodidea) कुल के नेमैटोडों (गोलकृमि) के संक्रमण से होता है। तीन प्रकार के कृमि इस बीमारी को जन्म देते हैं। ये हैं वुचिरेरिया बैंक्राफ्टाई (Wuchereria bancrofti), ब्रुजिया मलाई (Brugia malayi) औरब्रुजिया टिमोरीई (Brugia timori)। वुचिरेरिया बैंक्राफ्टाई इस बीमारी का सबसे सामान्य कारक है जो पूरे विश्व में पाया जाता है।
  • ब्रुजिया मलाई दक्षिण-पश्चिम भारत, चीन, इंडोनेशिया, मलेशिया, दक्षिण कोरिया, फिलिपींस और वियतनाम में पाया जाता है जबकि ब्रुजिया टिमोराई सिर्फ इंडोनेशिया तक ही सीमित है। 
  • वुचिरेरिया बैंक्राफ्टाई में नर कृमि 40 मिलीमीटर लंबा होता है जबकि मादा की लंबाई लगभग 50-100 मिलीमीटर होती है।
  • फाइलेरिया भारत में एक प्रमुख स्वास्थ्य समस्या है। यह संक्रामक बीमारी देश के राज्यों उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश, ओडिशा, तमिलनाडु, गुजरात, केरल एवं केन्द्र शासित प्रदेशों लक्षद्वीप और अंडमान निकोबार में स्थाई रूप से उभरती रहती है। 
  • भारत में मुख्य तौर पर फाइलेरिया के दो प्रकार के संक्रमण होते हैं, एक वुचिरेरिया बैंक्राफ्टाई से और दूसरा ब्रुजिया मलाई से। वुचिरेरिया बैंक्राफ्टाई के संक्रमण से होने वाला बैंक्रोफ्टियन फाइलेरिया (Bancroftian filaria) भारत में फाइलेरिया के कुल मामलों का लगभग 98 प्रतिशत होता है

कैसे फैलता है फाइलेरिया

  • फाइलेरिया मच्छरों से फैलता है जो परजीवी कृमियों के लिए रोगवाहक का काम करते हैं। 
  • इस परजीवी के लिए मनुष्य मुख्य पोषक है जबकि मच्छर इसके वाहक और मध्यस्थ पोषक हैं। 
  • कृमि प्रभावित क्षेत्रों से लोगों का रोजगार की तलाश में बाहर जाना, शहरीकरण, औद्योगिकीकरण, अज्ञानता, आवासीय सुविधाओं की कमी और स्वच्छता की अपर्याप्त स्थिति से यह संक्रमण फैलता है। 
  • संक्रमण के बाद कृमि के लार्वा संक्रमित व्यक्ति की रक्तधारा में बहते रहते हैं जबकि वयस्क कृमि मानव लसीका तंत्र में जगह बना लेता है। एक वयस्क कृमि की आयु सात वर्ष तक हो सकती है।
  •  संक्रमित मच्‍छर के काटने से इसके कीड़े फैलते है। जब मनुष्‍य बच्‍चा होता है तो आम तौर पर संक्रमण आरंभ हो जाता है। तीन प्रकार के कीड़े होते है जिनके कारण बीमारी फैलती है: Wuchereria bancrofti, Brugia malayi, और Brugia timori. Wuchereria bancrofti यह सबसे सामान्‍य है। यह कीड़ा lymphatic system को नुकसान पहुंचाता है।
  •  रात के समय एकत्रित किए गए खून को, एक प्रकार के सूक्ष्‍मदर्शी के द्वारा देखने पर इस बीमारी का पता चलता है। खून को thick smear के रूप में और Giemsa के साथ दाग के रूप में होना चाहिए।. बीमारी के विरूद्ध एंटीबाडियों हेतु खून की जांच भी की जा सकती है।
  • यह शोथ न्यूनाधिक होता रहता है, परंतु जब ये कृमि अंदर ही अंदर मर जाते हैं, तब लसीकावाहिनियों का मार्ग सदा के लिए बंद हो जाता है और उस स्थान की त्वचा मोटी तथा कड़ी हो जाती है। लसीका वाहिनियों के मार्ग बंद हो जाने से यदि अंग फूल जाएँ, तो कोई भी औषध ऐसी नहीं है जो अवरुद्ध लसीकामार्ग को खोल सके। 
  • कभी कभी किसी किसी रोगी में शल्यकर्म द्वारा लसीकावाहिनी का नया मार्ग बनाया जा सकता है। इस रोग के समस्त लक्षण फाइलेरिया के उग्र प्रकोप के समान होते हैं।

फाइलेरिया का घरेलू इलाज

इलाज बीमारी की शुरुआती अवस्था में ही शुरु हो जाना चाहिए। याद रखना चाहिए कि हाथों या पैरों की सूजन ठीक करने के लिए हमारे पास कोई भी दवाई नहीं है। डाईइथाइल – कार्बामाज़ीन (DEC) फाइलेरिया की एक दवा है। इसे दो हफ्तों दिया जाना चाहिए। इस दवा से सिर में दर्द, मितली, उल्टी जैसी प्रतिक्रियाएं हो सकती हैं। कभी कभी इससे एलर्जी भी हो जाती है। आप इसके बारे में और अधिक दवाइयों वाले अध्याय में पढ़ सकते हैं।

फाइलेरिया पर नियंत्रण या रोकथाम phayaleriya-check फायलेरिया जॉंच के लिये खून का नमूना रात में लेना पडता है इस बीमारी कृमि के कई एक वाहक इलाज के लिए नहीं पहुँचते। इसलिए संक्रमणग्रस्त इलाकों में सभी की जांच ज़रूरी है। ऐसा न होने पर बीमारी फैलती जाती है। जिन क्षेत्रों में फाइलेरिया की समस्या हो वहॉं खास सर्वे किए जाने ज़रूरी होते हैं। फाइलेरिया के नियंत्रण के लिए रात को खून के आलेप के नमूने इकट्ठे करना, रोकथाम के लिये दवा प्रयोग और बीएचसी छिडकाकर मच्छरों पर नियंत्रण करना जैसे कदम उठाना ज़रूरी है। जिन क्षेत्रों में फाइलेरिया की बीमारी ज़्यादा होती है वहॉं नमक में DEC दवा मिलाना ठीक रहता है। इससे यह सुनिश्चित हो जाता है कि हर व्यक्ति को यह दवा मिल जाए (कम मात्रा में) और इससे सूक्ष्म फाइलेरिया कृमि को मारा जा सकता है।

ये सूक्ष्म फाइलेरिया कृमि खून में घूमते रहते हैं। ऐसा खासकर रात को होता है। क्यूलैक्स मच्छर जब खून चूसता है तो वो इन सूक्ष्म फाइलेरिया को अपने अंदर ले लेता है। और संक्रमण पैदा करने वाले लार्वा के रुप में इनका विकास 10 से 15 दिनों के अंदर होता है। इस अवस्था में मच्छर बीमारी पैदा करने वाला होता है। इस तरह यह चक्र चलता रहता है।

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